रविवार, 22 अप्रैल 2012
शनिवार, 21 अप्रैल 2012
KISSA 1857
किस्सा 1857
1857 का स्वतन्त्रता संग्राम भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना ही नहीं थी यह साम्राज्यवाद के विरू़़द्ध उस दौर की विश्व की सबसे बड़ी जंग थी। इसी कारण मार्क्स ने अपने समकालीन लेखकोें मंे इस जंग की ‘फांस की क्रान्ति’ 1789 के युद्ध से तुलना की है और इसे फौजी बगावत न मानकर राष्ट्रीय विद्रोह की संज्ञा दी है।भारत वर्ष मंे बहुत से लोग आये। हुन, शक, कुशान, अरबी, तुर्क सभी आये मगर वह यहां की कल्चर में घुल-मिल गये। अंग्रेज जब भारत आये तो वह अपनी कल्चर भी साथ ले कर आये और भारत के जनजीवन को गहरे तक प्रभावित किया। क्या बताया भलाः
रागनी 1
बिदेशी बहोत आये भारत मैं वे देशी होगे आड़ै आकै।।
फिरंगी तो खुद रहया फिरंगी रंग म्हारा बदल्या हांगा लाकै।।
हून शक कुशान आये तो पहण लिया भारत का बाण़ा
अरबी तुर्क आये भारत मैं धारया म्हारा पीणा खाणा
कई-कई कल्चर मिली आपस मैं मिला लिया नया पुराणा
कई देशों का भारत यो म्हारा सबतै न्यारा इसका ताणा
फिरंगी नै राज जमाया या जात पात की खाई बढ़ाकै।।
अपणी कल्चर लयाया देश में म्हारा भेस अपनाया ना
म्हारे अंध विश्वास पै खेल्या पीछे मुड़कै लखाया ना
मैकाले ल्याया किसी शिक्षा यो खेल समझ में आया ना
रेल बिछाई पूरे देश मैं भारतवासी फुल्या समाया ना
कच्चा माल लेग्या लंदन मैं बेच्या पक्का भारत ल्याकै।।
सस्ते मैं लिया म्हारा कच्चा महंगे भाव दिया पक्का माल
दोनूं कान्यहां फिरगी नै भारत देश की तारी खाल
देख बायो डाय वर सिटी म्हारी अंग्रेजां ने गेरी राल
लूटे हम गेर फिरंगी नै श्याम दाम दण्ड भेद का जाल
बिठाये हम भगवान भरोसे ना देख्या हिसाब लगाकै।।
वार्ता------
भारत उन दिनों सामन्तों, राजा, नवाबों, जमीदारांे व तालुक दारों की रियासतों व जागीरों, जायदादों में बंटा हुआ था। इनके निहित स्वार्थों के चलते आपस में टकराव और विरोध था। रैयत भी विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, जातियों एवं गोत्रों में विभाजित थी। और इन तबकों के खाते-पीते पंडे-पुरोहित, चौधरी, सरदार, मुल्ला मौलवी और सामाजिक व साम्रदायिक इकाइयों के नेताओं में भी निहित स्वार्थों के कारण अपने-अपने समुदाय वाली गोल बन्दी बनी हुई थी,हालांकि 18 वीं सदी और पहले के भी भक्ति आन्दोलन, सन्त सूफी परम्परा ने पुराण पंथी नजरिये की सामाजिक सास्कृतिक दिवारों को कुछ कमजोर तो किया था। इस माहौल का अंग्रेजों ने बहुत फायदा उठाया। क्या बताया भलाः
रागनी-2
फूट गेरो राज करो का गुर अंग्रेजों ने अपनाया था।।
म्हारे लाडले भरती करकै उनको खूब दुलराया था।।
भारत की छाती पै मूंग दलैं इसकी पूरी तैयारी करली
मार-काट मची राज्यां मैं सबकी गद्यी पै नजर धरली
अंध विश्वास बढ़ा म्हारे मैं सोच्चण की ताकत हरली
जात-पात पै बंटे हुए थे हमनै नाष की कोली भरली
देशी गाभरू बनाकै फौजी अपने साथ मिलाया था।
भरती हो कै म्हारा बेटा बणग्या ताबेदार सिपाही फेर
मात पिता तैं मुंह मोड़ण मैं उसनै कति नहीं लाई देर
अंग्रेजां का गुणगाण करै दिन रात और श्याम सबेर
पाइया मुश्किल तै था बढ़ाकै होग्या कति सवा सेर
टूटे लीतर पाट्टे लत्ते अंग्रेजों ने वर्दी तै सजाया था।।
ये यू पी हरियाणा के छोरे फिरंगी के हुक्म बजावैं रै
अड़ौसी-पड़ौसी चाचा ताउ दरबारां मैं शीश झुकावैं रै
माल उगाही होज्या उसकी जो हम खेता मैं कमावैं रै
सिर भी म्हारा जूती म्हारी म्हारे अपणे डण्डे बरसावैं रै
सिपाही बेटा उनका होग्या बेराना के घोल पिलाया था।।
बढ़िया खाणा पीणा फौज मैं झोटे बरगे पुट्ठे होगे रै
दो दिन बिताये फौज मैं म्हारे बिराणे खूट्टे होगे रै
उनकी तै लागै स्वाद मिठाई म्हारे खारे बुट्टे होगे रै
अंग्रेजां के उनके दम पै म्हारी घिट्टी पै गूंठे होगे रै
कहै रणबीर बरोने आला न्यों अंग्रेज घणा बौराया था।
वार्ता-------
भारत वर्ष मंें अंग्रेजांे ने एक ईस्ट इंडिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर कदम रखे थे। इस प्रकार आहिस्ता-आहिस्ता पुरे भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा जमा लिया। दौ सौ साल तक भारत वर्ष पर राज किया। यह दौ सौ साल का इतिहास मानवता के इतिहास पर कालिख लगाने वाला, असमानतापूर्ण लूटों को बचाये रखने वाला था। एक समय के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी को हटाकर होम गर्वन मैंट की स्थापना कर ली गई थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के बारे में क्या बताया भलाः
रागनी-3
ईस्ट इंडिया कम्पनी आई, व्यापारी बणकै छाई
अंग्रेजी अपणे संग मैं ल्याई, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।,
भारत देश के मल-मल ये घणे मशहूर हुया करते
मिरच मसाले भारत के दुनिया भर मैं लिया करते
कारीगरां के गूंठे कटवाये, ढाका जिसे शहर उजड़वाये
मानचैस्टर उभार कै ल्याये, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
सहज-सहज ये राजे रजवाड़े कम्पनी की दाब मानगे
अंग्रेज काइयां बहोत घणे म्हारे सारे राज जानगे
कम्पनी ने चक्कर चलाया रै, व्यापार गेल्यां राज जमाया रै
चारो कान्ही लगांेट घूमाया रै, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
पढ़े लिखे हुश्यार घणे थे म्हारे उपर राज जमाया फेर
कर कै राज रजवाड़े काबू कम्पनियों नै डंका घुमाया फेर
प्रचार करया सभ्य समाज का, ना बेरा लग्या इनके अन्दाज का
चिड़िया उपर झपटा बाज का, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।,
एक ईस्ट इंडिया कम्पनी पूरे भारत उपर छागी देखो
म्हारी कमजोरी का ठाकै फायदा अपना राज जमागी देखो
मन मानी लूट मचाई फेर, सोने की चिड़िया चिल्लाई फेर
या बंगाल आर्मी बनाई फेर, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
वार्ता-------
अंग्रेजों ने धीरे-धीरे पूरी देशी फौज तैयार करली। जिसे बंगाल आर्मी के नाम से जाना गया। देसी लोगों की सेना से जिसे अंग्रेजों के ड्रिलसार्जेंट ने संगठित तथा प्रशिक्षित किया वह जहां अंग्रेजों के काम आई वहीं वह हिंदुस्तानी आत्मोत्यान की आवश्यक शर्त भी थी। देसी सेना अंग्रेजों की वफादार फौज मानी गई उस आर्मी में हिंदु व मुसलमान दोनों थे। कई साल तक इस आर्मी ने कई लड़ाइयां लड़ी जिसके चलते दोनों सम्प्रदाय के फौजियों में एकता और मजबूत हुई। क्या बताया भला:
रागनी-4
बंगाल आर्मी अंग्रेजां की उसका पूरा इतिहास सुणो।।
फिरंगी राज की नींव बताई इसपै था पूरा विश्वास सुणो।।
सवा लाख सिपाही इसमैं यू पी बिहार और हरियाणे के
खड़ग हस्त बने ब्रिटिस के सिपाही पूरे इस समाणे के
हिंदु मुस्लिम टिवाणे के बढ़िया सबका इकलास सुणो।।
ठारा सौ बत्तीस मैं आर्मी नै ग्वालियर मैं लड़ी लड़ाई
ठारा सौ चवालिस मैं सिंघ पै विजय पताका जा फैहराई
पंजाब की फेर बारी आई हुई आर्मी बदहवास सुणो।।
ठारा सौ बावण मैं बर्मा की लड़ाई दूसरी लड़ी फेर
दक्षिण बर्मा जीत दिखाया दुश्मन कर दिए हजारों ढेेर
डटे ंफ्रट पै लखमी शमशेर नहीं हुये ये निराश सुणो।।
अफीम यु़द्ध चीन देश का इसके सिर पै आण पड़या
ठारा सौ चालीस ब्यालिस मैं आर्मी सिपाही खूब लड़या
ठारा सौ छप्पण मैं फेर भिड़या बिछी हजारां लाश सुणो।।
लगातार लड़ाइयां मैं रही जो वा बंगाल आर्मी बताई
सिर धड़की या बाजी लाकै हमेशा लड़ती रही लड़ाई
रणबीर की कविताई नै जाणै गाम बरोणा खास सुणो।।
वार्ता------
अंग्रेजों ने भारत वासियों पर बहुत जुलम ढाये। पहले जमीन पर किसान का पूरा हक था मगर उन्हें जमीन से अलग कर दिया गया। जमीनों पर लगान वसूली बढ़ा दी गई। इतना लगान बढ़ा दिया जो भुगतान सामर्थ्य से बाहर था। औजार गिरवी रखने पर मजबूर किया जाने लगा। खेती करना असम्भव बना दिया। हल नहीं चला जमीन पर, फसल नहीं पर कर देने पर मजबूर किया गया। मंागी जा रही रकम नहीं दी तो यातनाएं दी गई। दिन की तपती दोपहर में पांव से बांधकर उल्टे लटकाया गया। लकड़ी की पैनी छिप्पटें नाखूनों में घुसाई गई। बाप और बेटों को एक साथ बांधकर कोड़े बरसाये गये। औरतों को कोड़े मारे जाते थे। आँखो में लाल मिर्च का चूरा बुरक दिया जाता था। गुनाहो का प्याला लबरेज हो गया। औरतों के स्तनों पर बिछू बांध दिये जाते थे। यह सब जुलमों की खबरे बंगाल आर्मी के फौजियों के पास भी पहंुची। क्या बताया गयाः
रागनी-5
बल्यू आइड आर्मी कहैं बगावत उपर आगी फेर।।
दम-दम मैं जो उठी चिन्गारी फैलण मैं ना लागी देर।।
ठारा सौ सतावण साल था जनवरी का म्हिना बताया रै
विद्रोह की जब लाली फूटी फिरंगी घणा ए घबराया रै
मंगल पाण्डे आगे आया रै नींद अंग्रेजां की भागी फेर।।
इसकी लपट मई के मैं मेरठ छावनी मैं पहोंच गई
मेरठ छावनी तै कूच करया दिल्ली आकै दबोच लई
फिरंगी की सोच बदल दई छाती मैं गोली दागी फेर।।
हिंदु मुस्लिम सिपाही सारे थे कठ्ठे लड़े सतावण मैं
पहले भी एकता थी उनकी मिलकै भिडे़ सतावण मैं
डटकै अड़े सतावण मैं या देश भावना जागी फेर।।
किसान और जमींदार दोनों फिरंगी खिलाफ खड़े होगे
दुनिया के साहसी खड़े इसपै ये सवाल बड़े होगे
फिरंगी और कड़े होगे मदद लंदन तै मांगी फेर।।
वार्ता-------
इस प्रकार इस विद्रोह के ज्यादा व्यापकता वाले कारण थे। देश प्रेम की भावना और अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ गुस्सा था। अंग्रेजों के प्रति सहानुभ्ूाति खत्म होती जा रही थी। ऐसी राष्ट्रीय भावना गौ और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों के इस्तेमाल से पैदा नहीं की जा सकती थी। ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि अंग्रेजों के विरूद्ध जंग में हमारे फौजियों ने इन्ही कारतूसों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया था। मेरठ से देसी फौज दिल्ली के लिए चल पड़ी। क्या बताया भलाः
रागनी-6
बंगाल आर्मी फौज के सिपाही डटगे रणभूमि मैं आकै।।
हिंदु मुस्लिम साथ लडंे फिरंगी पड़या तिवाला खाकै।।
हर जवान फौजी के दिल मंे उमंग भरी घणी भारी रै
सारै फौजी पाछै-पाछै चाले आगै पांडे क्रान्तिकारी रै
न्यों सोचैं थे फौजी तिरंगा लहरा दयां दिल्ली जाकै।।
तिल-तिल करकै आगे बढ़ते देश आजाद कराया चाहवैं
धर कांधे बन्दूक फौजी सभी कदम तै कदम मिलावैं
थी नई-नई तकरीब भिड़ाई सारै भाज्या फिरंगी घबराकै।।
महिला कति पाछै रही कोन्या हर जगां वो साथ लड़ी
अंग्रेजां नै होई धरती भीड़ी ये देखी औरत साथ खड़ी
पहली आजादी की जंग फिंरगी छोड़या कति रंभा कै।।,
बंगाल आर्मी फोजी सेना नया इतिहास रचाया था
तन-मन-धन सब लाकै देश आजाद कराना चाहया था
रणबीर सिंह करै कविताई रै कलम अपनी या ठाकै।।
वार्ता---------
मेरठ के बागियों ने 11 मई 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लेने के बाद मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को शंहशाह ए हिंदुस्तान बना दिया गया। इसके साथ ही बागी सैनिकों की निगाहें दिल्ली के आसपास के इलाके पर पड़ी। दिल्ली के तीन तरफ हरियाणा का क्षेत्र का है और 1803 कम्पनी राज ने दिल्ली समेत इसे महाराजा सिंधिया से छीनकर बंगाल प्रै्र्रसीडेंसी के उत्तर पश्चिमी प्रान्त का दिल्ली डिविजन बना दिया था। इसमें गुड़गांव रोहतक, हिसार, पानीपत और अंबाला के जिले शामिल थे। 11 मई को गुड़गावां पर कब्जा कर लिए जाने से शुरू हुई। एक मेव किसान सदरूद्दीन ने बागी सेना और किसानों व कारीगरों को नेतृत्व प्रदान किया। क्या बताया भलाः
रागनी-7
बढ़ां आगाड़ी भाई लड़ण का मौका है फिलहाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
दुश्मन का सामना करना है, फिरंगी के जुल्म तै के डरना है
एक रोज जरूरी मरना है, इसे आज मरे इसे काल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
नींव आजादी की हम धरज्यावां, हम नाम भारत का कर ज्यावां
देश की खातर कट कै मरज्यावां, म्हारा सबका योहे ख्याल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
कदम बढ़ावा फर्ज बुलावै सै, वीर मरद मिल बतलावै सै
देश गुलाम रखना चाहवै सै, यू अंग्रेज फिरंगी चाण्डाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
सदरूद्दीन नै लाया नारा, यो हिंदुस्तान सै सबनै प्यारा
बीर मरद रणबीर देश सारा, आजादी की उठैं झाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
दिल्ली पर 13 सितम्बर के बाद अंग्रेजीं सेना का कब्जा हो जाने पर भी मेवात के शूरवीर दिल्ली के हालात से बेखबर आजादी का परचम उठाये दो महीने तक अंग्रेजीं सेना के मशहूर जनरल शावर का मुकाबला करते रहे। राय सीमा के यु़द्ध में अंगेेज क्लेक्टर कोर्ड को 13 अक्टूबर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस सब के बावजूद देश आजाद कराने का जुनून था उनमें।
रागनी-8
फौजीं हैं देश दिवाने अब आजाद करा कर मानैंगे।।
हम आजादी पाने आये आजादी पाकर मानैंगे।।
गुलामी की जंजीरे टूटेगीं उस वक्त तसल्ली पायेंगे
पीछे हटने वाले नहीं लड़ते-लड़ते ही मर जायेंगे
हम भी किसी से कम नहीं तूफान उठाकर मानैंगे।।
फिरंगी ने जुलम ढाये कारीगरों के हाथ कटवायें
सोने की चिड़िया को फिरंगी कंगाल बनाना चाहे
एक बार कदम बढ़े हमारे तो मंजिल जाकर मानैंगे।।
मैदाने जंग में डटे हुए ज्यान की बाजी लगा रहे
देश की आजादी की खातर गोली सीने मैं खा रहें
नये तराने दिल में हैं हम इनको गाकर मानैंगे।।
कटते रहें बढ़ते रहें ये लाल खून रंग लायेगा
बंगाल आर्मी का फौजी आगे कदम बढ़ाता जायेगा
दे बड़ी से बड़ी से कुर्बानी हम दुश्मन को हिलाकर मानैंगे।।
1857 की क्रान्ति में कानपुर के योगदान की जब चर्चा होगी तो सबसे पहले नाना राव पेशवा, तात्या टोपे, और अजी मुल्ला का नाम आयेगा लेकिन नाच गाकर अंग्रेजी अफसंरो का मन बहलाने वाली तवायफ अजीजन बाई और उसकी मस्ताना टोली की सदस्य हुसैनी खानम के योगदान और बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता। अजीजन को हुस्न का जादू और घुंघरूओं की खनक अंग्रेज पर वह असर डालती थी जिससे शराब के नशे में मदहोश होकर अंग्रेज कई महत्वपूर्ण राज अजीजन के सामने ब्यान कर देते थे जो वह क्रान्तिकारियों को पहुंचाकर उनके आन्दोलन को मजबूत बना रही थी। बाद में अंग्रेजों ने इन्हें माफी मांगने तथा उनके सामने जमीन पर नाक रगड़ कर रहम की प्रार्थना करने को कहा। आजादी की इन सिपाहियों ने यह तो कबूल किया कि उन्होंने अंग्रेजों के खून से होली खेली है लेकिन देश का माथा ऊंचा रखते हुए माफी माँगने और रहम की भीख मांगने से इन्कार कर दिया।
रागनी-9
देश भक्ति की घणी निराली या मिशाल अजीजन बाई।।
फिरंगी के किले मैं नाच गाने के दम पै सेंध लगाई।।
कानपुर में तवायफ का वा जीवन बिताया करती
नाचना गाना कमाल का था अंग्रेजों नै रिझाया करती
नशे मैं धुत करने के वास्ते दारू खूब पिलाया करती
भीतर की सारी सी आई डी बागियों नै पहुंचाया करती
अजीजन के साथी हैरान तवायफ औरत गजब बताई।।
अंग्रेजां के छबके मारै अजीजन तरफ लखाले नै
चापलूसी छोड़ फिरंगी की देशप्रेम का झण्डा ठाले नै
तो जमींदार इलाके का ईब उल्टे कदम हटाले नै
देश प्रेम की बहार चली सुर गेल्यां सुर मिलाले नै
देख अजीजन की दलेरी तनै चाहिये बदलनी राही।।
कानपुर दिया छोड़ फिरंगी चारों तरफ लखाया
महिला बच्चों को उननै बीवी घर में पहोंचाया
अजीजन बाई ने घेरा दे उनका खात्मा चाहया
बागी फौजी तो नाट गये बाई नै गुस्सा आया
अजीजन बाई ने तुरत फेर बुलाये च्यार कसाई।।
इस जनम के करमां का फल इसे जनम मैं थ्याया
तवायफां नै डेढ़ सौ मारे फौज का पूरा साथ निभाया
फिरंगी का साथ नहीं देउं न्यों नसीब नै मन बनाया
जन विद्रोह देख फिरंगी रणबीर सिंह घणा घबराया
कई किताब पढ़कै नै रागनी अजीजन की बनाई।।
अजीजन जब बगावत का दौर था तो बहुत दिलेरी के साथ फौजियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी। एक दिन सोते वक्त अजीजन बाई सपने के अन्दर क्या देखती हैं भलाः
रागनी-10
ये अपने चाल पड़े हैं फौजी भारत देश के।।
बगावत पै जमे खड़े हैं फौजी भारत देश के।।
पूछती है झोपड़ी और पूछते हैं खेत भी
अब तक गुलाम पड़े हैं फौजी भारत देश के।।
बिना लड़े कुछ नहीं मिलता यहां यह जानकर
फिरंगी से सही भिड़े हैं फौजी भारत देश के।।
चीखती हैं रुकावटे ठोंकरों की मार से ही
ये होंसले लिए बड़़़े हैं फौजी भारत देश के।।
गुमान है इनकी खून से लतपथ लाशों पर
मोरचे पर खूब अड़े हैं फौजी भारत देश के।।
रोहतक को मुक्त कराने के लिए मुगल बादशाह बहादुर शाह जपफर ने 24 मई 1857 को सेना की एक टुकड़ी के साथ तफजुल हुसैन को रोहतक भेजा। विद्रोही सेना का मुकाबला न कर पा रोहतक का डिप्टी कमिश्नीर जी.डी. लाक व दूसरे अफसर पानीपत की छावनी की तरफ भाग निकले। कचहरी और सरकारी दफतर जला डाले। बागियों ने महम और मदीने पर कब्जा कर लिया। एक दिन एक किसान और उसकी पत्नी अंग्रेजों के बारे में बात करते हैं। पति अंग्रेजों के हक में था मगर पत्नी खिलाफ थी। क्या बताया भलाः
रागनी-11
नहीं देता तनै दिखाई इननै सिर पै चढ़ावै क्यों।।
भारत देश आगे बढ़ाया अंग्रेजां ने बिसरावै क्यों।।
न्यारे-न्यारे रजवाड़े थे कई देश आड़े बस्या करते
एक नै लेते अपनी गोदी दूंजे उपर ये हंस्या करते
तीर निशाने आपस के मैं ये रजवाड़े कस्या करते
बन्दर बांट मचा फिरंगी भारत नै ये डस्या करते
नीच फिरंगी मनै बता पिया तनै इतना भावै क्यों।।
अंग्रेजां ने सुण गोरी भारत राज्य एक बनाया सै
रेल और सड़को का इननै गहरा जाल बिछाया सै
बिदेशां नै मेहनत करी ना पाछै कदम हटाया सै
देख इनकी जीवन शैली मेरा तो सिर चकराया सै
कहै अंग्रेज नै फिरंगी इननै लुटेरे बतावै क्यों।।
भारत बणा कई देशां का भोतै बढ़िया काम करया
रेल बिछाकै म्हारे देश मैं अपने देश का गोदाम भरया
कच्चा माल लेग्या लाद कै म्हारा मजदूर तमाम मरया
लगान के कानून बदले निशानै लजवाणा गाम धरया
भूरा निंघाइया लड़े पिया बता उननै तूं भुलावै क्यों।।
मनै के बेरा जो कुछ देख्या वोहे मनै बताया गोरी
इतनी गहरी बात कदे मै समझ नहीं पाया गोरी
इनका जमींदार सै सूरता उसनै मैं बहकाया गोरी
रणबीर बरोने आला कहै तनै मैं समझाया गोरी
सारे सोचा मिल बैठ कै फिरंगी लूट कै खावैं क्यों।।
तफजुल हुसैन अब वापिस लौटते समय सांपला और मांडौठी के सरकारी दफतरों को भी आग देते गए। अंग्रेज अफसरों ने लिखा है कि उच्य वर्ग के लोगों से छोंटों तक सबकी हमदर्दी बादशाह के सैनिकों और बागियों के साथ है। परन्तु ज्यों ही रोहतक जिले में अंग्रेजी सत्ता समाप्त हुई किसान लोग कबिलाई आधार पर आपस में लड़ने लग गये। इन्हीं हालात में कम्पनी सरकार ने जी.डी लाक डिप्टी कमिश्नर को भारतीय रैजीमेंट के साथ रोहतक पर काबू पाने के लिए दोबरा रवाना कर दिया। खिड़वाली गांव के लोग आपस में इन बातों पर चर्चा करते हैं और गाम गुहांड में एकता बनाने की बात करते हैं। क्या बताया भलाः
रागनी-12
सारस बरगी जोट बणाकै, सब हों कट्ठे नर और नारी हो
खान फैक्टरी स्कूल मैं जाकै, साझा सघर्ष का बिगुल बजाकै
देश नै माना आजाद कराकै, यो फिरंगी घणा अत्याचारी हो।।
मजबूत यूनियन बणाकै, आपस के सब मतभेद भुलाकै
टी सी चमचा गिरी मिटाकै, बणै ढाल एकता न्यारी हो।।
न्यारे-न्यारे कड़ नै तड़वाकै, बैठे अपने घर नै जाकै
एक दूजे की चुगली खाकै, कुल्हाड़ी अपनंे पाहयां पर मारी हो।।
देखो उत्तर प्रदेश मैं जाकै, आंख खोल चारो तरफ लखाकै
हरियाणे तै चिट्ठी मंगवाकै, बूझो जो झूठी बात म्हारी हो।।
या जात पात की खाई हटाकै, सही गलत का अन्दाज लगाकै
साझे हकां की लिस्ट बणाकै, करां आजादी की तैयाारी हो।।
इनके राज ना सूरज छिपता, इनके साहमी कोए ना टिकता
नहीं इनका यो भकाना दिखता, म्हारी सबकी खाल उतारी हो।।
ईस्ट इडिंया पै लुटवाकै, कई हजार करोड़ मुनाफा दिवाकै
म्हारे कान्ही फेर हाथ हिलाकै, कहते किस्मत माड़ी थारी हो।।
उल्टे सीधे म्हारे पै कानून लाकै, साथ जेल का डर दिखलाकै
फेर पुलिस पै गोली चलवाकै, फिरंगी करेगा हमला भारी हो।।
पूरी जनता साथ मिलाकै, हरतबके नै या बात समझाकै
ना रहै रणबीर कहै कसम उठाकै फेर फिरंगी भ्रष्टाचारी हो।।
17 अगस्त को बाबर खान के तहत 300 रांघड़ घुडसवारों और 1000 पैदल सैनिकों ने अंग्रेजी सेना पर रोहतक पर धावा बोल दिया। लड़ाई बड़ी भीषण थी। परन्तु कुछ समय बाद अंग्रेजी सैनिक शक्ति की और अधिक कुमुक आ जाने के बाद बागियों को रोहतक छोड़कर हांसी के पास बसी गांव मंे मोर्चा जमाना पड़ा। हडसन खरखोदा, सांपला, पानीपत, महम गोहाना आदि कस्बों का दबाने के बाद इलाके को जींद के महाराजा और चौधारियों के हाथ सौंप कर चला गया। इस लड़ाई में खिडवाली के कई शहीद हुए थे। क्या बताया भलाः
रागनी-13
ठारा सौ सतावण में आजादी की पहली जंग लड़ी।।
खिडवाली की पलटन नै तोड़ी कई मजबूत कड़ी।।
माणस खिडवाली के भिड़गं अंग्रेजां के साहमी जाकै
दो फिरंगी तहसील मैं मारे मेम पड़ी तिवाला खाकै
भीतरला जमा भरया पड़या बाट देखैं थे एडडी ठाकै
पाछले जुल्मां का सारा हिसाब फेर धरा लिया आकै
फिरंगी से लड़णे की पूरी गुप्त योजना सही घड़ी।।
बही शेख और लालू वाल्मिकी जमकै लड़ी लड़ई थी
तिरखा बाल्मिकी मोहमा शेख हिम्मत खूब दिखाई थी
जुलफी मोची सुनार राम बक्स आजादी पानी चाही थी
बेमा बाल्मिकी इदुर मौची ने ज्यान की बाजी लााई थी
मुफी औला पठान लडया साथ मैं जनता खूब भिड़ी।।
मोहर नीलगर खिडवाली का ना मुड़कै कदे लखाया
सायर बाल्मिकी लड़ाकू नै फिरंगी तै सबक सिखाया
सुनाकी बाल्मिकी साथ लड़या वो कदे नहीं घबराया
बीर मरद जितने सबनै धुर ताहिं का साथ निभाया
फिरंगी राज के कफन मैं इस जंग नै कील जड़ी।।
खिडवाली ना रहया एकला साथ गामड़ी आया था
एक बै कब्जा रोहतक पै सबने मिलकै जमाया था
फिरंगी भाज लिया था नहीं कोए रास्ता पाया था
बहादुर शाह जफर को राजा सबने ही अपनाया था
रणबीर बरोने आला बतावै जंग की बात बड़ी।।
अलीपुरा और सोनीपत के बीच लिबास पुर कुंडली, मुरथल, बहाल गढ़, खानपुर, हमीद पुर सराय के वीरों ने बार-बार अंग्रेजी सेना और उनकी कानवाई पर हमले करने शुरू कर दिये। लिबास पुर के उदमीराम की युवको की टोली के कारनामें आज भी लोक गीतों में याद किये जाते हैं। इन छोटी-छोटी लड़ाइयों में इलाके के अनेक लोक शहीद हुए। अलीपुर गांव के 70-75 लोग शहीद हुए थे। लोगों को दो बातों का अहसास इस लड़ाई ने करवा दिया था। एक तो मजबूत संगठन की कमी और दूसरे मजबूत नीडर का अभाव। बागी देहात के हमलों का ही नतीजा था कि कम्पनी राज को अपनी पानीपत की छावनी करनाल ले जानी पड़ी थी। उदमीराम को यातनाएं दी गई उसे पेड़ पर लटका कर हाथों पैरों मंे कीले गाड़ दी गई। उदमीराम ने उस वक्त भारत वर्ष के लिए लोगों को संदेश दिया था। क्या बताया भलाः
रागनी-14
संगठन के आधार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
भाइचारे के प्र्रसार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी नै कर दिये चाले घरां कै लवा दिये ताले
आपस के रै प्यार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
बच्चे और बूढ़े होगें तंग बुरा महिलावां का यो ढंग
समता के व्यवहार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी के राज मैं जुल्म बढ़े बहोत माणस फांसी पै चढ़ै
आजादी के उभार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
मानवता का खून करया सै, म्हारा कालजा भून गिरया सै
लीडर की पतवार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी कै घेरी देनी होगी, बिपता सबनै या खेणी होगी
रणबीर एतबार बिना, म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
1857 की आजादी की पहली जंग हुई। चार महीने तक दिल्ली पर हमारा राज्य स्थापित हो गया। बहुत से कारणों से चलते अंग्रेजों ने फिर कब्जा कर लिया। इतना तसदुद किया कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह जंग उस वक्त तक के सबसे महान आंदोलनों में एक थी। अंग्रेजों के पिठूओं को इनाम दिये गये तथा विद्रोहियों पर कहर ढाया गया। उसी दौर में एक मुहावरा चला साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी नहीं होनी चाहिये। मगर एक बात साप हो गई कि अंग्रेजों का भारत से जाना शत प्रतिशत तय हो गया था जो कि सौ साल बाद हुआ। देश के शहीदो को दुनिया की कोई ताकत नहीं मार सकती। क्या बताया भलाः
रागनी-15
समाज की खातर मरने वाले आज तलक तो मरे नहीं।।
कुरबान देश पर होने वाले कदे किसी से डरे नहीं।।
अजीजन की हंसी हवा में आज भी न्योंए गूंज रही
चारों धाम यो मच्या तहलका हो दुनिया मैं बूझ रही
बैरी को नहीं सूझ रही पिछले गढे इबै भरे नहीं।।
फौजियां मैं जगा बनाई सी आई डी बढ़िया ढाल करी
उन बख्तां मैं अजीजन नै पेश कुरबानी की मिशाल धरी
जवानी मैं हुंकार भरी कदे होंसले म्हारे गिरे नहीं
मेरठ आम्बाला और मेवात एक बर ली अंगड़ाई थी
मिलकै लड़ी लड़ाई थी न्यारे रहे लाल पीले हरे नहीं।।
बेशक पहली जंग हारे अंग्रेज का जाना लाजमी होग्या
ठारा सौ सतावण बीज देश मैं म्हारी आजादी के बोग्या
अंग्रेज का सूरज डबोग्या बेशक हम भी पार तिरे नहीं।।
सतावण नै राह दिखाई हजारा मंगल पांडे आगै आये
सौ साल पाछै बलिदान सैंतालिस मैं हटकै रंग ल्याये
रणबीर सिंह नै छन्द बनाये कलम दवात जरे नहीं।
1857 का स्वतन्त्रता संग्राम भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना ही नहीं थी यह साम्राज्यवाद के विरू़़द्ध उस दौर की विश्व की सबसे बड़ी जंग थी। इसी कारण मार्क्स ने अपने समकालीन लेखकोें मंे इस जंग की ‘फांस की क्रान्ति’ 1789 के युद्ध से तुलना की है और इसे फौजी बगावत न मानकर राष्ट्रीय विद्रोह की संज्ञा दी है।भारत वर्ष मंे बहुत से लोग आये। हुन, शक, कुशान, अरबी, तुर्क सभी आये मगर वह यहां की कल्चर में घुल-मिल गये। अंग्रेज जब भारत आये तो वह अपनी कल्चर भी साथ ले कर आये और भारत के जनजीवन को गहरे तक प्रभावित किया। क्या बताया भलाः
रागनी 1
बिदेशी बहोत आये भारत मैं वे देशी होगे आड़ै आकै।।
फिरंगी तो खुद रहया फिरंगी रंग म्हारा बदल्या हांगा लाकै।।
हून शक कुशान आये तो पहण लिया भारत का बाण़ा
अरबी तुर्क आये भारत मैं धारया म्हारा पीणा खाणा
कई-कई कल्चर मिली आपस मैं मिला लिया नया पुराणा
कई देशों का भारत यो म्हारा सबतै न्यारा इसका ताणा
फिरंगी नै राज जमाया या जात पात की खाई बढ़ाकै।।
अपणी कल्चर लयाया देश में म्हारा भेस अपनाया ना
म्हारे अंध विश्वास पै खेल्या पीछे मुड़कै लखाया ना
मैकाले ल्याया किसी शिक्षा यो खेल समझ में आया ना
रेल बिछाई पूरे देश मैं भारतवासी फुल्या समाया ना
कच्चा माल लेग्या लंदन मैं बेच्या पक्का भारत ल्याकै।।
सस्ते मैं लिया म्हारा कच्चा महंगे भाव दिया पक्का माल
दोनूं कान्यहां फिरगी नै भारत देश की तारी खाल
देख बायो डाय वर सिटी म्हारी अंग्रेजां ने गेरी राल
लूटे हम गेर फिरंगी नै श्याम दाम दण्ड भेद का जाल
बिठाये हम भगवान भरोसे ना देख्या हिसाब लगाकै।।
वार्ता------
भारत उन दिनों सामन्तों, राजा, नवाबों, जमीदारांे व तालुक दारों की रियासतों व जागीरों, जायदादों में बंटा हुआ था। इनके निहित स्वार्थों के चलते आपस में टकराव और विरोध था। रैयत भी विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, जातियों एवं गोत्रों में विभाजित थी। और इन तबकों के खाते-पीते पंडे-पुरोहित, चौधरी, सरदार, मुल्ला मौलवी और सामाजिक व साम्रदायिक इकाइयों के नेताओं में भी निहित स्वार्थों के कारण अपने-अपने समुदाय वाली गोल बन्दी बनी हुई थी,हालांकि 18 वीं सदी और पहले के भी भक्ति आन्दोलन, सन्त सूफी परम्परा ने पुराण पंथी नजरिये की सामाजिक सास्कृतिक दिवारों को कुछ कमजोर तो किया था। इस माहौल का अंग्रेजों ने बहुत फायदा उठाया। क्या बताया भलाः
रागनी-2
फूट गेरो राज करो का गुर अंग्रेजों ने अपनाया था।।
म्हारे लाडले भरती करकै उनको खूब दुलराया था।।
भारत की छाती पै मूंग दलैं इसकी पूरी तैयारी करली
मार-काट मची राज्यां मैं सबकी गद्यी पै नजर धरली
अंध विश्वास बढ़ा म्हारे मैं सोच्चण की ताकत हरली
जात-पात पै बंटे हुए थे हमनै नाष की कोली भरली
देशी गाभरू बनाकै फौजी अपने साथ मिलाया था।
भरती हो कै म्हारा बेटा बणग्या ताबेदार सिपाही फेर
मात पिता तैं मुंह मोड़ण मैं उसनै कति नहीं लाई देर
अंग्रेजां का गुणगाण करै दिन रात और श्याम सबेर
पाइया मुश्किल तै था बढ़ाकै होग्या कति सवा सेर
टूटे लीतर पाट्टे लत्ते अंग्रेजों ने वर्दी तै सजाया था।।
ये यू पी हरियाणा के छोरे फिरंगी के हुक्म बजावैं रै
अड़ौसी-पड़ौसी चाचा ताउ दरबारां मैं शीश झुकावैं रै
माल उगाही होज्या उसकी जो हम खेता मैं कमावैं रै
सिर भी म्हारा जूती म्हारी म्हारे अपणे डण्डे बरसावैं रै
सिपाही बेटा उनका होग्या बेराना के घोल पिलाया था।।
बढ़िया खाणा पीणा फौज मैं झोटे बरगे पुट्ठे होगे रै
दो दिन बिताये फौज मैं म्हारे बिराणे खूट्टे होगे रै
उनकी तै लागै स्वाद मिठाई म्हारे खारे बुट्टे होगे रै
अंग्रेजां के उनके दम पै म्हारी घिट्टी पै गूंठे होगे रै
कहै रणबीर बरोने आला न्यों अंग्रेज घणा बौराया था।
वार्ता-------
भारत वर्ष मंें अंग्रेजांे ने एक ईस्ट इंडिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर कदम रखे थे। इस प्रकार आहिस्ता-आहिस्ता पुरे भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा जमा लिया। दौ सौ साल तक भारत वर्ष पर राज किया। यह दौ सौ साल का इतिहास मानवता के इतिहास पर कालिख लगाने वाला, असमानतापूर्ण लूटों को बचाये रखने वाला था। एक समय के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी को हटाकर होम गर्वन मैंट की स्थापना कर ली गई थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी के बारे में क्या बताया भलाः
रागनी-3
ईस्ट इंडिया कम्पनी आई, व्यापारी बणकै छाई
अंग्रेजी अपणे संग मैं ल्याई, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।,
भारत देश के मल-मल ये घणे मशहूर हुया करते
मिरच मसाले भारत के दुनिया भर मैं लिया करते
कारीगरां के गूंठे कटवाये, ढाका जिसे शहर उजड़वाये
मानचैस्टर उभार कै ल्याये, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
सहज-सहज ये राजे रजवाड़े कम्पनी की दाब मानगे
अंग्रेज काइयां बहोत घणे म्हारे सारे राज जानगे
कम्पनी ने चक्कर चलाया रै, व्यापार गेल्यां राज जमाया रै
चारो कान्ही लगांेट घूमाया रै, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
पढ़े लिखे हुश्यार घणे थे म्हारे उपर राज जमाया फेर
कर कै राज रजवाड़े काबू कम्पनियों नै डंका घुमाया फेर
प्रचार करया सभ्य समाज का, ना बेरा लग्या इनके अन्दाज का
चिड़िया उपर झपटा बाज का, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।,
एक ईस्ट इंडिया कम्पनी पूरे भारत उपर छागी देखो
म्हारी कमजोरी का ठाकै फायदा अपना राज जमागी देखो
मन मानी लूट मचाई फेर, सोने की चिड़िया चिल्लाई फेर
या बंगाल आर्मी बनाई फेर, दाब्या म्हारा प्यारा हिंदुस्तान।।
वार्ता-------
अंग्रेजों ने धीरे-धीरे पूरी देशी फौज तैयार करली। जिसे बंगाल आर्मी के नाम से जाना गया। देसी लोगों की सेना से जिसे अंग्रेजों के ड्रिलसार्जेंट ने संगठित तथा प्रशिक्षित किया वह जहां अंग्रेजों के काम आई वहीं वह हिंदुस्तानी आत्मोत्यान की आवश्यक शर्त भी थी। देसी सेना अंग्रेजों की वफादार फौज मानी गई उस आर्मी में हिंदु व मुसलमान दोनों थे। कई साल तक इस आर्मी ने कई लड़ाइयां लड़ी जिसके चलते दोनों सम्प्रदाय के फौजियों में एकता और मजबूत हुई। क्या बताया भला:
रागनी-4
बंगाल आर्मी अंग्रेजां की उसका पूरा इतिहास सुणो।।
फिरंगी राज की नींव बताई इसपै था पूरा विश्वास सुणो।।
सवा लाख सिपाही इसमैं यू पी बिहार और हरियाणे के
खड़ग हस्त बने ब्रिटिस के सिपाही पूरे इस समाणे के
हिंदु मुस्लिम टिवाणे के बढ़िया सबका इकलास सुणो।।
ठारा सौ बत्तीस मैं आर्मी नै ग्वालियर मैं लड़ी लड़ाई
ठारा सौ चवालिस मैं सिंघ पै विजय पताका जा फैहराई
पंजाब की फेर बारी आई हुई आर्मी बदहवास सुणो।।
ठारा सौ बावण मैं बर्मा की लड़ाई दूसरी लड़ी फेर
दक्षिण बर्मा जीत दिखाया दुश्मन कर दिए हजारों ढेेर
डटे ंफ्रट पै लखमी शमशेर नहीं हुये ये निराश सुणो।।
अफीम यु़द्ध चीन देश का इसके सिर पै आण पड़या
ठारा सौ चालीस ब्यालिस मैं आर्मी सिपाही खूब लड़या
ठारा सौ छप्पण मैं फेर भिड़या बिछी हजारां लाश सुणो।।
लगातार लड़ाइयां मैं रही जो वा बंगाल आर्मी बताई
सिर धड़की या बाजी लाकै हमेशा लड़ती रही लड़ाई
रणबीर की कविताई नै जाणै गाम बरोणा खास सुणो।।
वार्ता------
अंग्रेजों ने भारत वासियों पर बहुत जुलम ढाये। पहले जमीन पर किसान का पूरा हक था मगर उन्हें जमीन से अलग कर दिया गया। जमीनों पर लगान वसूली बढ़ा दी गई। इतना लगान बढ़ा दिया जो भुगतान सामर्थ्य से बाहर था। औजार गिरवी रखने पर मजबूर किया जाने लगा। खेती करना असम्भव बना दिया। हल नहीं चला जमीन पर, फसल नहीं पर कर देने पर मजबूर किया गया। मंागी जा रही रकम नहीं दी तो यातनाएं दी गई। दिन की तपती दोपहर में पांव से बांधकर उल्टे लटकाया गया। लकड़ी की पैनी छिप्पटें नाखूनों में घुसाई गई। बाप और बेटों को एक साथ बांधकर कोड़े बरसाये गये। औरतों को कोड़े मारे जाते थे। आँखो में लाल मिर्च का चूरा बुरक दिया जाता था। गुनाहो का प्याला लबरेज हो गया। औरतों के स्तनों पर बिछू बांध दिये जाते थे। यह सब जुलमों की खबरे बंगाल आर्मी के फौजियों के पास भी पहंुची। क्या बताया गयाः
रागनी-5
बल्यू आइड आर्मी कहैं बगावत उपर आगी फेर।।
दम-दम मैं जो उठी चिन्गारी फैलण मैं ना लागी देर।।
ठारा सौ सतावण साल था जनवरी का म्हिना बताया रै
विद्रोह की जब लाली फूटी फिरंगी घणा ए घबराया रै
मंगल पाण्डे आगे आया रै नींद अंग्रेजां की भागी फेर।।
इसकी लपट मई के मैं मेरठ छावनी मैं पहोंच गई
मेरठ छावनी तै कूच करया दिल्ली आकै दबोच लई
फिरंगी की सोच बदल दई छाती मैं गोली दागी फेर।।
हिंदु मुस्लिम सिपाही सारे थे कठ्ठे लड़े सतावण मैं
पहले भी एकता थी उनकी मिलकै भिडे़ सतावण मैं
डटकै अड़े सतावण मैं या देश भावना जागी फेर।।
किसान और जमींदार दोनों फिरंगी खिलाफ खड़े होगे
दुनिया के साहसी खड़े इसपै ये सवाल बड़े होगे
फिरंगी और कड़े होगे मदद लंदन तै मांगी फेर।।
वार्ता-------
इस प्रकार इस विद्रोह के ज्यादा व्यापकता वाले कारण थे। देश प्रेम की भावना और अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ गुस्सा था। अंग्रेजों के प्रति सहानुभ्ूाति खत्म होती जा रही थी। ऐसी राष्ट्रीय भावना गौ और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों के इस्तेमाल से पैदा नहीं की जा सकती थी। ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि अंग्रेजों के विरूद्ध जंग में हमारे फौजियों ने इन्ही कारतूसों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया था। मेरठ से देसी फौज दिल्ली के लिए चल पड़ी। क्या बताया भलाः
रागनी-6
बंगाल आर्मी फौज के सिपाही डटगे रणभूमि मैं आकै।।
हिंदु मुस्लिम साथ लडंे फिरंगी पड़या तिवाला खाकै।।
हर जवान फौजी के दिल मंे उमंग भरी घणी भारी रै
सारै फौजी पाछै-पाछै चाले आगै पांडे क्रान्तिकारी रै
न्यों सोचैं थे फौजी तिरंगा लहरा दयां दिल्ली जाकै।।
तिल-तिल करकै आगे बढ़ते देश आजाद कराया चाहवैं
धर कांधे बन्दूक फौजी सभी कदम तै कदम मिलावैं
थी नई-नई तकरीब भिड़ाई सारै भाज्या फिरंगी घबराकै।।
महिला कति पाछै रही कोन्या हर जगां वो साथ लड़ी
अंग्रेजां नै होई धरती भीड़ी ये देखी औरत साथ खड़ी
पहली आजादी की जंग फिंरगी छोड़या कति रंभा कै।।,
बंगाल आर्मी फोजी सेना नया इतिहास रचाया था
तन-मन-धन सब लाकै देश आजाद कराना चाहया था
रणबीर सिंह करै कविताई रै कलम अपनी या ठाकै।।
वार्ता---------
मेरठ के बागियों ने 11 मई 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लेने के बाद मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को शंहशाह ए हिंदुस्तान बना दिया गया। इसके साथ ही बागी सैनिकों की निगाहें दिल्ली के आसपास के इलाके पर पड़ी। दिल्ली के तीन तरफ हरियाणा का क्षेत्र का है और 1803 कम्पनी राज ने दिल्ली समेत इसे महाराजा सिंधिया से छीनकर बंगाल प्रै्र्रसीडेंसी के उत्तर पश्चिमी प्रान्त का दिल्ली डिविजन बना दिया था। इसमें गुड़गांव रोहतक, हिसार, पानीपत और अंबाला के जिले शामिल थे। 11 मई को गुड़गावां पर कब्जा कर लिए जाने से शुरू हुई। एक मेव किसान सदरूद्दीन ने बागी सेना और किसानों व कारीगरों को नेतृत्व प्रदान किया। क्या बताया भलाः
रागनी-7
बढ़ां आगाड़ी भाई लड़ण का मौका है फिलहाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
दुश्मन का सामना करना है, फिरंगी के जुल्म तै के डरना है
एक रोज जरूरी मरना है, इसे आज मरे इसे काल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
नींव आजादी की हम धरज्यावां, हम नाम भारत का कर ज्यावां
देश की खातर कट कै मरज्यावां, म्हारा सबका योहे ख्याल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
कदम बढ़ावा फर्ज बुलावै सै, वीर मरद मिल बतलावै सै
देश गुलाम रखना चाहवै सै, यू अंग्रेज फिरंगी चाण्डाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
सदरूद्दीन नै लाया नारा, यो हिंदुस्तान सै सबनै प्यारा
बीर मरद रणबीर देश सारा, आजादी की उठैं झाल
वीर महिला भारत मां के लाल।।
दिल्ली पर 13 सितम्बर के बाद अंग्रेजीं सेना का कब्जा हो जाने पर भी मेवात के शूरवीर दिल्ली के हालात से बेखबर आजादी का परचम उठाये दो महीने तक अंग्रेजीं सेना के मशहूर जनरल शावर का मुकाबला करते रहे। राय सीमा के यु़द्ध में अंगेेज क्लेक्टर कोर्ड को 13 अक्टूबर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस सब के बावजूद देश आजाद कराने का जुनून था उनमें।
रागनी-8
फौजीं हैं देश दिवाने अब आजाद करा कर मानैंगे।।
हम आजादी पाने आये आजादी पाकर मानैंगे।।
गुलामी की जंजीरे टूटेगीं उस वक्त तसल्ली पायेंगे
पीछे हटने वाले नहीं लड़ते-लड़ते ही मर जायेंगे
हम भी किसी से कम नहीं तूफान उठाकर मानैंगे।।
फिरंगी ने जुलम ढाये कारीगरों के हाथ कटवायें
सोने की चिड़िया को फिरंगी कंगाल बनाना चाहे
एक बार कदम बढ़े हमारे तो मंजिल जाकर मानैंगे।।
मैदाने जंग में डटे हुए ज्यान की बाजी लगा रहे
देश की आजादी की खातर गोली सीने मैं खा रहें
नये तराने दिल में हैं हम इनको गाकर मानैंगे।।
कटते रहें बढ़ते रहें ये लाल खून रंग लायेगा
बंगाल आर्मी का फौजी आगे कदम बढ़ाता जायेगा
दे बड़ी से बड़ी से कुर्बानी हम दुश्मन को हिलाकर मानैंगे।।
1857 की क्रान्ति में कानपुर के योगदान की जब चर्चा होगी तो सबसे पहले नाना राव पेशवा, तात्या टोपे, और अजी मुल्ला का नाम आयेगा लेकिन नाच गाकर अंग्रेजी अफसंरो का मन बहलाने वाली तवायफ अजीजन बाई और उसकी मस्ताना टोली की सदस्य हुसैनी खानम के योगदान और बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता। अजीजन को हुस्न का जादू और घुंघरूओं की खनक अंग्रेज पर वह असर डालती थी जिससे शराब के नशे में मदहोश होकर अंग्रेज कई महत्वपूर्ण राज अजीजन के सामने ब्यान कर देते थे जो वह क्रान्तिकारियों को पहुंचाकर उनके आन्दोलन को मजबूत बना रही थी। बाद में अंग्रेजों ने इन्हें माफी मांगने तथा उनके सामने जमीन पर नाक रगड़ कर रहम की प्रार्थना करने को कहा। आजादी की इन सिपाहियों ने यह तो कबूल किया कि उन्होंने अंग्रेजों के खून से होली खेली है लेकिन देश का माथा ऊंचा रखते हुए माफी माँगने और रहम की भीख मांगने से इन्कार कर दिया।
रागनी-9
देश भक्ति की घणी निराली या मिशाल अजीजन बाई।।
फिरंगी के किले मैं नाच गाने के दम पै सेंध लगाई।।
कानपुर में तवायफ का वा जीवन बिताया करती
नाचना गाना कमाल का था अंग्रेजों नै रिझाया करती
नशे मैं धुत करने के वास्ते दारू खूब पिलाया करती
भीतर की सारी सी आई डी बागियों नै पहुंचाया करती
अजीजन के साथी हैरान तवायफ औरत गजब बताई।।
अंग्रेजां के छबके मारै अजीजन तरफ लखाले नै
चापलूसी छोड़ फिरंगी की देशप्रेम का झण्डा ठाले नै
तो जमींदार इलाके का ईब उल्टे कदम हटाले नै
देश प्रेम की बहार चली सुर गेल्यां सुर मिलाले नै
देख अजीजन की दलेरी तनै चाहिये बदलनी राही।।
कानपुर दिया छोड़ फिरंगी चारों तरफ लखाया
महिला बच्चों को उननै बीवी घर में पहोंचाया
अजीजन बाई ने घेरा दे उनका खात्मा चाहया
बागी फौजी तो नाट गये बाई नै गुस्सा आया
अजीजन बाई ने तुरत फेर बुलाये च्यार कसाई।।
इस जनम के करमां का फल इसे जनम मैं थ्याया
तवायफां नै डेढ़ सौ मारे फौज का पूरा साथ निभाया
फिरंगी का साथ नहीं देउं न्यों नसीब नै मन बनाया
जन विद्रोह देख फिरंगी रणबीर सिंह घणा घबराया
कई किताब पढ़कै नै रागनी अजीजन की बनाई।।
अजीजन जब बगावत का दौर था तो बहुत दिलेरी के साथ फौजियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी। एक दिन सोते वक्त अजीजन बाई सपने के अन्दर क्या देखती हैं भलाः
रागनी-10
ये अपने चाल पड़े हैं फौजी भारत देश के।।
बगावत पै जमे खड़े हैं फौजी भारत देश के।।
पूछती है झोपड़ी और पूछते हैं खेत भी
अब तक गुलाम पड़े हैं फौजी भारत देश के।।
बिना लड़े कुछ नहीं मिलता यहां यह जानकर
फिरंगी से सही भिड़े हैं फौजी भारत देश के।।
चीखती हैं रुकावटे ठोंकरों की मार से ही
ये होंसले लिए बड़़़े हैं फौजी भारत देश के।।
गुमान है इनकी खून से लतपथ लाशों पर
मोरचे पर खूब अड़े हैं फौजी भारत देश के।।
रोहतक को मुक्त कराने के लिए मुगल बादशाह बहादुर शाह जपफर ने 24 मई 1857 को सेना की एक टुकड़ी के साथ तफजुल हुसैन को रोहतक भेजा। विद्रोही सेना का मुकाबला न कर पा रोहतक का डिप्टी कमिश्नीर जी.डी. लाक व दूसरे अफसर पानीपत की छावनी की तरफ भाग निकले। कचहरी और सरकारी दफतर जला डाले। बागियों ने महम और मदीने पर कब्जा कर लिया। एक दिन एक किसान और उसकी पत्नी अंग्रेजों के बारे में बात करते हैं। पति अंग्रेजों के हक में था मगर पत्नी खिलाफ थी। क्या बताया भलाः
रागनी-11
नहीं देता तनै दिखाई इननै सिर पै चढ़ावै क्यों।।
भारत देश आगे बढ़ाया अंग्रेजां ने बिसरावै क्यों।।
न्यारे-न्यारे रजवाड़े थे कई देश आड़े बस्या करते
एक नै लेते अपनी गोदी दूंजे उपर ये हंस्या करते
तीर निशाने आपस के मैं ये रजवाड़े कस्या करते
बन्दर बांट मचा फिरंगी भारत नै ये डस्या करते
नीच फिरंगी मनै बता पिया तनै इतना भावै क्यों।।
अंग्रेजां ने सुण गोरी भारत राज्य एक बनाया सै
रेल और सड़को का इननै गहरा जाल बिछाया सै
बिदेशां नै मेहनत करी ना पाछै कदम हटाया सै
देख इनकी जीवन शैली मेरा तो सिर चकराया सै
कहै अंग्रेज नै फिरंगी इननै लुटेरे बतावै क्यों।।
भारत बणा कई देशां का भोतै बढ़िया काम करया
रेल बिछाकै म्हारे देश मैं अपने देश का गोदाम भरया
कच्चा माल लेग्या लाद कै म्हारा मजदूर तमाम मरया
लगान के कानून बदले निशानै लजवाणा गाम धरया
भूरा निंघाइया लड़े पिया बता उननै तूं भुलावै क्यों।।
मनै के बेरा जो कुछ देख्या वोहे मनै बताया गोरी
इतनी गहरी बात कदे मै समझ नहीं पाया गोरी
इनका जमींदार सै सूरता उसनै मैं बहकाया गोरी
रणबीर बरोने आला कहै तनै मैं समझाया गोरी
सारे सोचा मिल बैठ कै फिरंगी लूट कै खावैं क्यों।।
तफजुल हुसैन अब वापिस लौटते समय सांपला और मांडौठी के सरकारी दफतरों को भी आग देते गए। अंग्रेज अफसरों ने लिखा है कि उच्य वर्ग के लोगों से छोंटों तक सबकी हमदर्दी बादशाह के सैनिकों और बागियों के साथ है। परन्तु ज्यों ही रोहतक जिले में अंग्रेजी सत्ता समाप्त हुई किसान लोग कबिलाई आधार पर आपस में लड़ने लग गये। इन्हीं हालात में कम्पनी सरकार ने जी.डी लाक डिप्टी कमिश्नर को भारतीय रैजीमेंट के साथ रोहतक पर काबू पाने के लिए दोबरा रवाना कर दिया। खिड़वाली गांव के लोग आपस में इन बातों पर चर्चा करते हैं और गाम गुहांड में एकता बनाने की बात करते हैं। क्या बताया भलाः
रागनी-12
सारस बरगी जोट बणाकै, सब हों कट्ठे नर और नारी हो
खान फैक्टरी स्कूल मैं जाकै, साझा सघर्ष का बिगुल बजाकै
देश नै माना आजाद कराकै, यो फिरंगी घणा अत्याचारी हो।।
मजबूत यूनियन बणाकै, आपस के सब मतभेद भुलाकै
टी सी चमचा गिरी मिटाकै, बणै ढाल एकता न्यारी हो।।
न्यारे-न्यारे कड़ नै तड़वाकै, बैठे अपने घर नै जाकै
एक दूजे की चुगली खाकै, कुल्हाड़ी अपनंे पाहयां पर मारी हो।।
देखो उत्तर प्रदेश मैं जाकै, आंख खोल चारो तरफ लखाकै
हरियाणे तै चिट्ठी मंगवाकै, बूझो जो झूठी बात म्हारी हो।।
या जात पात की खाई हटाकै, सही गलत का अन्दाज लगाकै
साझे हकां की लिस्ट बणाकै, करां आजादी की तैयाारी हो।।
इनके राज ना सूरज छिपता, इनके साहमी कोए ना टिकता
नहीं इनका यो भकाना दिखता, म्हारी सबकी खाल उतारी हो।।
ईस्ट इडिंया पै लुटवाकै, कई हजार करोड़ मुनाफा दिवाकै
म्हारे कान्ही फेर हाथ हिलाकै, कहते किस्मत माड़ी थारी हो।।
उल्टे सीधे म्हारे पै कानून लाकै, साथ जेल का डर दिखलाकै
फेर पुलिस पै गोली चलवाकै, फिरंगी करेगा हमला भारी हो।।
पूरी जनता साथ मिलाकै, हरतबके नै या बात समझाकै
ना रहै रणबीर कहै कसम उठाकै फेर फिरंगी भ्रष्टाचारी हो।।
17 अगस्त को बाबर खान के तहत 300 रांघड़ घुडसवारों और 1000 पैदल सैनिकों ने अंग्रेजी सेना पर रोहतक पर धावा बोल दिया। लड़ाई बड़ी भीषण थी। परन्तु कुछ समय बाद अंग्रेजी सैनिक शक्ति की और अधिक कुमुक आ जाने के बाद बागियों को रोहतक छोड़कर हांसी के पास बसी गांव मंे मोर्चा जमाना पड़ा। हडसन खरखोदा, सांपला, पानीपत, महम गोहाना आदि कस्बों का दबाने के बाद इलाके को जींद के महाराजा और चौधारियों के हाथ सौंप कर चला गया। इस लड़ाई में खिडवाली के कई शहीद हुए थे। क्या बताया भलाः
रागनी-13
ठारा सौ सतावण में आजादी की पहली जंग लड़ी।।
खिडवाली की पलटन नै तोड़ी कई मजबूत कड़ी।।
माणस खिडवाली के भिड़गं अंग्रेजां के साहमी जाकै
दो फिरंगी तहसील मैं मारे मेम पड़ी तिवाला खाकै
भीतरला जमा भरया पड़या बाट देखैं थे एडडी ठाकै
पाछले जुल्मां का सारा हिसाब फेर धरा लिया आकै
फिरंगी से लड़णे की पूरी गुप्त योजना सही घड़ी।।
बही शेख और लालू वाल्मिकी जमकै लड़ी लड़ई थी
तिरखा बाल्मिकी मोहमा शेख हिम्मत खूब दिखाई थी
जुलफी मोची सुनार राम बक्स आजादी पानी चाही थी
बेमा बाल्मिकी इदुर मौची ने ज्यान की बाजी लााई थी
मुफी औला पठान लडया साथ मैं जनता खूब भिड़ी।।
मोहर नीलगर खिडवाली का ना मुड़कै कदे लखाया
सायर बाल्मिकी लड़ाकू नै फिरंगी तै सबक सिखाया
सुनाकी बाल्मिकी साथ लड़या वो कदे नहीं घबराया
बीर मरद जितने सबनै धुर ताहिं का साथ निभाया
फिरंगी राज के कफन मैं इस जंग नै कील जड़ी।।
खिडवाली ना रहया एकला साथ गामड़ी आया था
एक बै कब्जा रोहतक पै सबने मिलकै जमाया था
फिरंगी भाज लिया था नहीं कोए रास्ता पाया था
बहादुर शाह जफर को राजा सबने ही अपनाया था
रणबीर बरोने आला बतावै जंग की बात बड़ी।।
अलीपुरा और सोनीपत के बीच लिबास पुर कुंडली, मुरथल, बहाल गढ़, खानपुर, हमीद पुर सराय के वीरों ने बार-बार अंग्रेजी सेना और उनकी कानवाई पर हमले करने शुरू कर दिये। लिबास पुर के उदमीराम की युवको की टोली के कारनामें आज भी लोक गीतों में याद किये जाते हैं। इन छोटी-छोटी लड़ाइयों में इलाके के अनेक लोक शहीद हुए। अलीपुर गांव के 70-75 लोग शहीद हुए थे। लोगों को दो बातों का अहसास इस लड़ाई ने करवा दिया था। एक तो मजबूत संगठन की कमी और दूसरे मजबूत नीडर का अभाव। बागी देहात के हमलों का ही नतीजा था कि कम्पनी राज को अपनी पानीपत की छावनी करनाल ले जानी पड़ी थी। उदमीराम को यातनाएं दी गई उसे पेड़ पर लटका कर हाथों पैरों मंे कीले गाड़ दी गई। उदमीराम ने उस वक्त भारत वर्ष के लिए लोगों को संदेश दिया था। क्या बताया भलाः
रागनी-14
संगठन के आधार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
भाइचारे के प्र्रसार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी नै कर दिये चाले घरां कै लवा दिये ताले
आपस के रै प्यार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
बच्चे और बूढ़े होगें तंग बुरा महिलावां का यो ढंग
समता के व्यवहार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी के राज मैं जुल्म बढ़े बहोत माणस फांसी पै चढ़ै
आजादी के उभार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
मानवता का खून करया सै, म्हारा कालजा भून गिरया सै
लीडर की पतवार बिना म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
फिरंगी कै घेरी देनी होगी, बिपता सबनै या खेणी होगी
रणबीर एतबार बिना, म्हारा ऊट मटिल्ला हो ज्यागा।।
1857 की आजादी की पहली जंग हुई। चार महीने तक दिल्ली पर हमारा राज्य स्थापित हो गया। बहुत से कारणों से चलते अंग्रेजों ने फिर कब्जा कर लिया। इतना तसदुद किया कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह जंग उस वक्त तक के सबसे महान आंदोलनों में एक थी। अंग्रेजों के पिठूओं को इनाम दिये गये तथा विद्रोहियों पर कहर ढाया गया। उसी दौर में एक मुहावरा चला साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी नहीं होनी चाहिये। मगर एक बात साप हो गई कि अंग्रेजों का भारत से जाना शत प्रतिशत तय हो गया था जो कि सौ साल बाद हुआ। देश के शहीदो को दुनिया की कोई ताकत नहीं मार सकती। क्या बताया भलाः
रागनी-15
समाज की खातर मरने वाले आज तलक तो मरे नहीं।।
कुरबान देश पर होने वाले कदे किसी से डरे नहीं।।
अजीजन की हंसी हवा में आज भी न्योंए गूंज रही
चारों धाम यो मच्या तहलका हो दुनिया मैं बूझ रही
बैरी को नहीं सूझ रही पिछले गढे इबै भरे नहीं।।
फौजियां मैं जगा बनाई सी आई डी बढ़िया ढाल करी
उन बख्तां मैं अजीजन नै पेश कुरबानी की मिशाल धरी
जवानी मैं हुंकार भरी कदे होंसले म्हारे गिरे नहीं
मेरठ आम्बाला और मेवात एक बर ली अंगड़ाई थी
मिलकै लड़ी लड़ाई थी न्यारे रहे लाल पीले हरे नहीं।।
बेशक पहली जंग हारे अंग्रेज का जाना लाजमी होग्या
ठारा सौ सतावण बीज देश मैं म्हारी आजादी के बोग्या
अंग्रेज का सूरज डबोग्या बेशक हम भी पार तिरे नहीं।।
सतावण नै राह दिखाई हजारा मंगल पांडे आगै आये
सौ साल पाछै बलिदान सैंतालिस मैं हटकै रंग ल्याये
रणबीर सिंह नै छन्द बनाये कलम दवात जरे नहीं।
KISSA ANDEE SADDAM
सर्वाधिकार
शीतल प्रकाशन
वार्ता: नफे सिंह गांव बिलासपुर का रहने वाला है। भारत में नौकरी नहीं मिली तो दे ले के इराक सन् 1988 में चला जाता है। पहले इराक पर हमले में भी वह वहां था। उसकी घरवाली सरतो गांव में ही है। नफे सिंह अब फिर देखता है अमरीका की दादागिरी का खेल। अपने दोस्त अमन से चरचा करता है। अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इराक के खिलाफ एक तरफ युद्ध का ऐलान कर रखा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के नियमों और अनुरोधों को भी ताक पर रखकर अमरीका इराक पर धवा बोलने की घोषणएं कर रहा है। पूरी दुनिया में केवल ब्रिटेन ही अमरीका का पैरोकार बना हुआ है। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के हथियार निरीक्षक दल को इराक में जन-संहारक हथियारों की मौजूदगी का कोई सबूत नहीं मिला है। इराक की जनता में साम्प्रदायिक समुदायों के मतभेदों को अमरीका हवा देता रहता है। क्या बताया कवि ने भला:
यू एन ओ कती पढ़ण बिठादी कर दिया गुड़ का राला रै।।
कहै जिसकी लाठी भैंस उसी की रोप्या मोट्टा चाला रै।।
निरीक्षण कमेटी नै इराक जमा दोषी नहीं पाया रै
एक तरफा हमले का अमरीका नै बिगुल बजाया रै
झूठा प्रचार फैलाया रै कहै इराक का मैं रुखाला रै।।
सारी दुनिया खड़ी कर दी मौत के आज किनारे पै
महाघोर प्रलय हो ज्यागी बुश के एक इशारे पै
फांसी लाई इराक बेचारे पै ना हो जंग का टाला रै।।
अमरीकी सेना नै जुलमी प्लान क्यों बनाया बता
सारा संसार सेना के दम पै इनै क्यों डराया बता
छल प्रपंच क्यों रचाया बता बुन मकड़ी का जाला रै।।
तेल भण्डारां पै कब्जा यो अमरीका जमाना चाहवै
सद्दाम या मानता कोण्या ज्यां इसनै भजाना चाहवै
रणबीर सिंह कराना चाहवै अमरीका का मुंह काला रै।।
वार्ता: सरतो सुबह का काम करके चारपाई पर बैठ कर अखबार पढ़ने लगती है। अमरीका को बुश का ऐलान इराक के खिलाफ पढ़ती है तो नफेसिंह की बहोत याद आती है। वह पढ़ती है कि अमरीका का यह दावा कि इराक के खिलाफ जंग आतंकवाद के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा है, सफेद झूठ है। यह प्रचार भी गलत है कि इराक पश्चिमी दुनिया के लिए बड़ा भारी फौजी खतरा है। सच्चाई तो यह है कि अमरीका सभी अमन पसन्द गरीब देशों के लिए खतरा बना हुआ है। वह पूरी दुनिया को धमका रहा है, शेखी खोरी दिखा रहा है और घमण्ड में चूर है। सच तो यह है कि अमरीका के पास दुनिया के सबसे घातक हथियारों का जखीरा है। वह क्या सोचती है भला -
इराक के खिलापफ जंग के क्यों पागल घोड़े छोड़ दिये।।
सद्दाम पै तोहमद लगाकै मुंह तोपां के क्यों मोड़ दिये।।
कब्जा करना इराक के उपर या युद्ध की जड़ मैं दीखै
तेल के बदले खून बहाना मामला गड़बड़ मैं दीखै
बम्बां की अकड़ मैं दीखै गरीब देशां के मुंह फोड़ दिये।।
आज तलक ना देखे सुने इसे हथियार पिना राखै
कहै दो दिनां मैं सीधा कर द्यूं इराक नै पंख फैला राखै
बुश नै ये देश भका राखै कइयां के बांह मरोड़ दिये।।
कहै बुश जो अमरीका चाहवै वो करकै नै दिखावै गा
सद्दाम घणा आण्डी पाकै इसनै सही सबक सिखावैगा
इराक नै ध्ूाल चटावैगा ये घाटे नफे सब जोड़ लिये।।
बगदाद तबाह करकै नै लंगोट घुमाया चाहवै सै
दानव आला रूप यौ अपणा छल तै छिपाया चाहवै सै
रणबीर नै दबाया चाहवै सै काढ़ सही निचोड़ लिये।।
वार्ता: नफेसिंह की चिट्ठी नहीं आई। सरतो को चिन्ता होने लगती है। जंग आजकल में होने वाला है। टी.वी. पर परमाणु बम के खतरे की भी बात चलती है कि सब कुछ तबाह हो जाएगा। वह नफेसिंह को बहुत याद करती है और मन में क्या सोचती है भला:
परमाणु बम्ब कहैं पिया दुनियां मैं तबाही मचा देगा।।
परमाणु की अग्नि मारै क्यूकर यो भगवान बचा देगा।।
धमाका होवै गरमी छाज्या शहर राख हो ज्यां जल कै
तबाह मानवता हो ज्यागी खतम जंगल होज्या बल कै
संसार बचाना होज्या रल कै अमरीका आग लगा देगा।।
धुंए की परत का काम्बल आसमान मैं आ ज्यागा
सूरज की रोशनी नै चूसै घनघोर अन्धेरा छाज्यागा
घणा बैरी ठारा खाज्यागा जीव जन्तू नै गला देगा।।
बरफ तै सीली होवै धरती उतर तै दक्षिण लहर चलै
उतर का जिब नाश होवै नहीं दक्षिण का कहर टलै
पूरा गांव और शहर गलै फेर खेती कौण उगा देगा।।
खाणे की चेन समुन्द्र मैं तहस नहस भाई हो ज्यागी
मानव पेड़ और पौध्यां की भूख में तबाही हो ज्यागी
बचे नै बीमारी माई खोज्यागी रणबीर कौण जिवादेगा।।
वार्ता: नफेसिंह को सरतो की लिखी चिट्ठी मिलती है। सरतो ने नफेसिंह के लिए चिन्ता जताई है। वह लिखता है कि पहले हमले के बाद से इराक पर प्रतिबन्ध लगा है। 5 लाख बच्चे भूख के कारण व बीमारी में दवाई की कमी के कारण मर चुके हैं। पिछले हमले से ही इराक उबर नहीं पाया है। इराक के तेल को दूसरे देशों में भेजने पर रोक है। परन्तु फिर भी लोग सद्दाम को बहुत चाहते हैं। हां कुर्द लोग तथा एकाध सम्प्रदाय के लोग जरूर सद्दाम को दूसरी नजर से देखते हैं। इराक के लोग व सद्दाम वे बारे में क्या सोचते हैं वह लिख कर भेजता है।
धन-धन सै सद्दाम तनै, बुश की थामी लगाम तनै
विश्व याद करै तमाम तनै, यो तेरा नाम अमर होग्या।।
दोगली नीति अमरीका की, धौंस पट्टी अमरीका की
बुश नै डंडे का जोर दिखाया, इराक बिना बात चोर बताया
तनै संघर्ष का दौर सिखाया, यो तेरा नाम होग्या।।
अमरीका की सेना भारी सै, बेशरमी चौड़े मैं दिखारी सै
इराक झुकाना आसान कड़ै, बुश तनै यो उनमान कड़ै
फांसी तै मरया सद्दाम कड़ै, उसका नाम अमर होग्या।।
सद्दाम नै हंस कै फांसी खाई, नकाब ओढण की करी मनाही
दुनिया तै दिया सही पैगाम, बुश तो चाहता तेल तमाम
अमरीका कै कसो लगाम, यो तेरा नाम अमर होग्या।।
इराकी बहादुरी दिखावैंगे, कोन्या अपना शीश झुकावैंगे
रणबीर सिंह का गाम बरोना, सिख्या मुश्किल छन्द पिरोना
अमरीका का काम घिनोना, ये तेरा नाम अमर होग्या।।
वार्ता: सद्दाम को फांसी की सजा सुनाई गई तो सरतो को बहुत बुरा लगता है। फिर अगले दिन खबर आती है कि कोई दलील, अपील नहीं मानी गई और फांसी का वक्त तय कर दिया गया। 30 दिसम्बर को टी.वी. पर फांसी का सीन देखती है तो रो पड़ती है सरतो और क्या कहती है:
सद्दाम नै पूरा इराक चाहवै, नफेसिंह नहीं झूठ भकावै,
एकाध बै कुर्दां पै जुलम ढावै, याहे सै असली तसवीर गोरी।।
जनता खातर पूरी हमदर्दी, अमरीका दीखै उसनै खुदगर्जी
ब्रिटेन फ्रांस जर्मनी सारे कै, कहैं युद्ध मत थोपो म्हारे पै
कट्ठे हों सद्दाम के इशारे पै, याहे सै असली तसवीर गोरी।।
देश भीतर बंदर बांट मचाकै, कुर्दां गेल्या सद्दाम लड़वाकै
अमरीका चाहता मैं बैठूं आकै, याहे तो सै तसवीर गोरी।।
पर इराकी बहादुरी दिखावैं, कोन्या अपना शीश झुकावैं
दुनिया रोकैगी युद्ध घमसान, राम रहीम और रहमान
शान्ति का करते गुणगान, याहे सै असली तसवीर गोरी।।
अमरीका की सेना छारी सै, जुलमों सितम या ढारी सै
इराक दबाना आसान कोन्या, बुश नै यो उनमान कोन्या
रणबीर शैतान सै इन्सान कोन्या, याहे सै असली तसवीर गोरी।।
वार्ता: एक दिन बिलासपुर गांव में ज्ञान विज्ञान समिति के चर्चा मण्डल की बैठक होती है। उसमें चर्चा अमरीका की दादागीरी पर होती है। वहां बताते हैं कि अमरीका बनाम शेष विश्व का मामला है यह! अमरीका किसी भी कीमत पर इराक में सरकार परिवर्तन चाहता है। सन् 1991 से अन्तहीन युद्ध इराक के खिलाफ चलाया जा रहा है। उस युद्ध में अमरीका के लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने 1,10,000 हवाई उड़ानें भरी थी और 88,500 टन बम गिराये थे। उस युद्ध में 1,50,000 इराकी मारे गये थे। घर, अस्पताल, स्कूल कुछ भी नहीं बख्शा था। मामला अमरीका और इराक का नहीं है। मसला ये है कि पूरी दुनिया में अमन बराबरी और मानवता वादी मूल्यों को स्थापित करना है या अमरीका का गलबा कायम होना है। वापिस आते हुए सरतो अपने मन-मन में नफेसिंह को याद करती है और क्या सोचती है भला:
अमरीका मनै बतादे नै क्यों हुया इसा अन्याई तूं।।
इराक देश नै मिटाकै नै किसकी चाहवै भलाई तूं।।
खुद हथियार जखीरे लेरया ओरां पै रोक लगावै
दस साल तै पाबन्दी लाकै इराक नै भूखा मारना चाहवै
मतना इतने जुलम कमावै बणकै बकर कसाई तूं।।
जमीनी लड़ाई बिना तेरै इराक हाथ नहीं आणे का
इराक खतम करे बिना ना जमीनी कब्जा थ्याणे का
गाणा सही गाणे का क्यों दुश्मन बण्या जमाई तूं।।
खून मुंह कै लाग्या तेरै फिर अफगानिस्तान के मां
मानवता कती पढ़ण बिठादी तनै सारे जहान के मां
बची सै इन्सान के मां या खत्म करै अच्छाई तूं।।
सब देशां मैं नारे उठे जंग हमनै चाहिये ना
तेल की खातर ओ पापी लहू मानवता का बहाइये ना
आगै फौज बढ़ाइये ना बस करणी छोड़ बुराई तूं।।
वार्ता: सरतो को ज्ञान विज्ञान वालों का निमन्त्राण मिलता है रोहतक आने का, अमरीका के खिलाफ युद्ध के विरोध में जुलूस में शामिल होने का। सरतो अपनी सहेली सरोज के साथ मानसरोवर पार्क में पहुंच जाती है। वहां ज्ञान विज्ञान की नेता शुभा बताती है कि हम समझते हैं कि ज्ञान और विज्ञान का प्रयोग दुनिया को बेहतर बनाने के लिए, जरूरतों को पूरा करने में होना चाहिये न कि उनके भविष्य को छीनने के लिए। हैरानी की बात यह है कि युद्ध,आतंक, हिंसा और नशे का पूरी दुनिया में जाल बिछाने वाला अमरीका दूसरे देशों को दण्डित कर रहा है, उन पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा रहा है, तलाशियां ले रहा है और फतवे जारी कर रहा है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार 65 प्रतिशत अमेरिका जनता सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना हमले का विरोध करती है। बुश प्रशासन इराक पर व्यापक विनाश के हथियारों को रखने और इन हथियारों के उत्पादन की सहूलियतों को छिपाने का आरोप लगा रहा है। दूसरा झूठ है कि बिना किसी थोड़े से सबूत के इराकी सरकार को अलकायदा से जोड़ने की कोशिश में है ताकि उसे हमला करने का बहाना मिल सके। तीसरा झूठ यह है कि बुश ने घोषणा की है कि इराक को उसके राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की निरंकुशता से मुक्त कराने के लिए युद्ध की जरूरत है। इस सरकार को बदल कर इराक में जनतन्त्रा लागू करने का वायदा किया गया है।
इराक पर हमले के बहाने खोज रहा है अमरीका। मगर दुनिया की जनता ने सड़कों पर आकर बता दिया कि हमें युद्ध नहीं चाहिये। सरतो वापिस आ जाती है। रात को उसे सपना आता है। सुबह वह अपनी जिठानी से सुपने का जिकर करती है। क्या बताती है भला:
के बताउं जिठानी तनै तेरा देवर सपने म्हां आया री।।
देख कै हालत उसकी आई नहीं पहचान के म्हां काया री।।
बिखरे बिखरे बाल थे उसके मूंछ और दाढ़ी बढ़ी हुई
ना न्हाया ना खाया दीखै चेहरे की हड्डी कढ़ी हुई
नींद एक गाड्डी चढ़ी हुई घणी चिन्ता के म्हां पाया री।।
बैठी होले न्यों बोल्या जंग के पूरे आसार होगे
सारी दुनिया युद्ध ना चाहवै अमरीकी मक्कार होगे
माणस लाखां हजार होंगे मिलकै सबने नारा लाया री।।
चीं करकै जहाज हवाई आसमान मैं आन्ता दिख्या
बटन दाब कै बम्ब गेरया पति मनै कराहन्ता दिख्या
दरद मैं चिल्लान्ता दिख्या उनै हाथ हवा मैं ठाया री।।
इतना देख कै मनै अपनी छाती पै हाथ फिरा देख्या
आंख उघड़गी मेरी घबराकै घोर अन्ध्ेरा निरा देख्या
रणबीर सिंह नै घिरा देख्या तुरत मदद कै म्हां आया री।।
वार्ता: नफेसिंह उसका दोस्त अमर और तीन-चार इराक निवासी आपस में चरचा कर रहे हैं। नफे सिंह कहता है कि अमरीका इराक पर हमला करके उसके तेल के श्रोतों पर कब्जा करना चाहता है और पूरे एशिया में अमरीका हितों को आगे बढ़ाना चाहता है। सद्दाम हुसैन को हटाकर अपनी पिट्ठू सरकार थोंपने का मंसूबा अमरीका ने बना लिया लगता है। इराक के बाद उत्तरी कोरिया को भी सबक सिखाने का ऐलान किया है। असल में अमरीका पूरी दुनिया में अपना गलबा कायम करना चाहता है। क्या बताया कवि ने:
फौज के दम पै बुश नै अमरीका नम्बर एक बनाया।।
चौदहा लाख सतरा हजार का मिलट्री बेड़ा कसूत सजाया।।
चालीस तै लेकै आज ताहिं का पैंटागन का खरचा गिणाउं
उन्नीस ट्रिलियन डालर खर्चे सुनियो सब खोल सुणाउं
आगले चार साल मैं एक ट्रिलियम डालर खर्च बताउं
सारी दुनिया मुट्ठी मैं करले झुकते सबके सिर दिखाउं
बोल्या खबरदार जो किसै नै म्हारे कामां मैं रोड़ा अटकाया।।
अमरीका क्ै सरमाये दारां की जंगी फौज रूखाल करैगी
इनक्ै मुनाफै बचावण नै या दुनिया नै कंगाल करैगी
इन बरगे हथियार जिनपै उनकी पूरी पड़ताल करैगी
कर दुनिया की मण्डी काबू अमरीका नै मालोमाल करैगी
पैंटागन क्ै धेंास पै संसार के म्हां लंगोट घुमाया।।
जंग की मशीनां उपर खरचा इसनै खूब बढ़ाया आज
चार सौ बिलियन डालर का खरचा बजट बनाया आज
जिन देशां नै बी आंख उठाई उनको सबक सिखाया आज
अमरीका नै दुनिया ताहिं मानवता का पाठ पढ़ाया आज
बुश बोल्या जाहिल जगत तै विकास का सबका सिखाया।।
एक की उसे बात पर देखी खूब लड़ाई करती रै
दूजे की उसे बात पर देखी घणी बुराई करती रै
कई बै जालम फौज उसकी घणी अंघाई करती रै
दूजे के हथियार देखैं ना अपनी सफाई करती रै
रणबीर सिंह साची लिखै ना झूठा का साथ निभाया।।
वार्ता: सरतो अखबार में पढ़ती है कि 1998 से इराक को बुनियादी तौर पर शस्त्राविहीन कर दिया गया। इराक की व्यापक विनाश के हथियारों की 90-95 प्रतिशत क्षमता को खत्म कर दिया गया है जिसकी पुष्टि की जा सकती है। इसमें रासायनिक, जैविक और नाभिकीय हथियार बनाने तथा लम्बी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण करने वाली सभी फैक्ट्रियों से सम्बन्ध्ति उपकरण और इन फैक्ट्रियों से बाहर आने वाले उत्पादों की भारी संख्या शामिल है। सरतो सोचती है कि इस सबके बावजूद अमरीका क्यों अड़ा हुआ है हमले करने पर। उसकी अपने देवर से चर्चा होती है। देवर अपने ढंग से देखता है इस जंग को। क्या बताया भला:
जमा ज्यान तै मारे देवर अमरीका अन्याई नै।।
भाभी तेरा के खोस्या सै के दुख सरतो भरपाई नै।।
इस साल का सुणले मिलट्री का खर्च गिणाउं
बे उनमाना खर्च हुआ इन हथियारों पै दिखाउं
कमाई खून पसीने की लूटै सै अमरीका बताउ
नाश हुया सुणाउं बुश के जानै पीर पराई नै।।
इराक के म्हां के होरया सै मनै सारी खोल बतादे
क्यों बुश और सद्दाम भिड़े किसकी रोल बतादे
भाभी क्यों दुखी होरी सै बात सही तोल बतादे
किसके गलत बोल बतादे दिखा खोल बुराई नै।।
टी.वी. अखबार रुक्के मारैं मेरे पै क्यों कुहावै सै
आहमी साहमी कड़ै सेना एक तरफा धैंास जमावै सै
उल्टा सुल्टा सुल्टा उल्टा इराक नै यो फंसावै सै
सब नै सबक सिखावै सै सद्दाम की कर पिटाई नै।।
हाली पानी और लंफगे हमनै लड़ते देखे थे
डाकू फीमची रणबीर धक्का करते देखे थे
सुधां खोसड़यां दूजै पै देश ना चढ़ते देखे थे
ये गुण्डे ना पुजते देखे थे चमेली धापां मां जाई नै।।
वार्ता: सरतो को चिट्ठी लिखने की तैयारी करता है नफेसिंह। वह लिखता है कि इराक पर हमला करके अमेरिका विश्व को यह बताना चाहता है कि कोई भी देश यदि महाशक्ति की इच्छा का उल्लंघन करने की कोशिश करेगा तो दंड से नहीं बच सकता। बाकी यहां हम अपने बचाव की पूरी तैयारी में हैं। तुम चिन्ता मत करना, मगर चिट्ठी लिखती रहना। क्या लिखता है भला:
नहीं कोए चिट्ठी आई तेरी आन्ता मेरै सबर नहीं सै।।
के होरया सै मेरी गेल्यां इसकी तनै खबर नहीं सै।।
ठीक ठाक सही सलामत सूं फिकर मेरा करिये मतना
पढ़ अखबारां नै सुबो सबेरी खामखा मैं डरिये मतना
चिन्ता गात मैं भरिये मतना आच्छा घणा फिकर नहीं सै।।
पीस्सा भेजूं तावल करकै बालकां का ध्यान करिये
दोष अमरीका का सै सारा ना ओरां की कान धरिये
तूं सद्दाम का बखान करिये आन्डी मैं कसर नहीं सै।।
ब्रिटेन और अमरीका नै सिर अपना जोड़ लिया
इटली अरब और जापान सबनै मिल तोड़ किया
भारत ने मुंह मोड़ लिया समझ आवै हसर नहीं सै।।
खाड़ी मैं किसका हुकम चलै इस बात पै जंग जारी
रणबीर ताकत देख दुनिया की बुश कै अधरंग मारी
इराक मैं उमंग भारी छोड्डी अपनी डगर नहीं सै।।
वार्ता: सरतो नफेसिंह की चिट्ठी पढ़कर क्या सोचती है भला:
कई स्वारथ साध्ेा चाहवै अमरीका जंग की आड़ मैं।।
दुनिया नै डराना चाहवै लगा टीका सब की जाड़ मैं।।
इराक को बुश नै ध्ुारी बुराई की बताया आज
काल ताहिं सद्दाम बढ़िया भूण्डा क्यों दिखाया आज
इराक इरान उत्तर कोरिया एक साथ बिठाया आज
आतंकवाद के बाबू नै देखो इराक सताया आज
क्यूकर होवै तेल बंटाई फंसगे आपस की राड़ मैं।।
उसके पिट्ठू इराकी जितने सबमैं लाखां डालर बांटे
कटपुतली सरकार ताहिं उसनै अपने गुर्गे छांटे
गुप्त योजना घड़ी बताई सब ताहि बतावण तै नाटे
जिननै सवाल करया कोई वे घणी कसूती ढाला डांटे
अपणी मण्डी बधवण ताहि आग लाई देशां की बाड़ मैं।।
नब्बे मैं बम्ब बरसाकै इराक मैं लाखां लोग मार दिये
महिला बच्चे और बूढ़े बिन मौत के घाट उतार दिये
दो हजार पाउंड का बम्ब इराक पै कसूते वार किये
पाबन्दी चाली आवै जिबतै भूख नै लोग बीमार किये
अमरीका देखै स्वारथ अपना बाकी जाओ सब भाड़ मैं।।
इजराइल फिलीस्तीन नै घणी कसूती ढाल सतावै
अमरीका इजराइल का क्यों जमकै नै साथ निभावै
प्रधानमंत्राी मारया जिसनै उनै शांति पुरुष बतावै
बिन लादेन का यारी बता सद्दाम नै सबक सिखावै
कहै रणबीर भरैगी बुड़का जनता बुश की नाड़ मैं।।
वार्ता: अमरीका की पीस आन्दोलन की महिला भारी युद्ध विरोधी जलूस में शामिल होती है। कई लाख लोगों का जलूस था। ब्रिटेन में भी उसी दिन 20 लाख से ज्यादा लोग युद्ध विरोधी आन्दोलन की पुकार पर सड़कों पर उतर आते हैं। वह महिला बुश को एक पत्रा लिखती है। उसमें क्या लिखा भला:
तीन झूठ बुश तेरे सबकै साहमी ल्याउंगी।।
चेहरे पीछे की कालस सबनै आज दिखाउंगी।।
पहला झूठ तनै बताया इराक के हथियारां का
ये तेरे भरे जखीरे निरीक्षण दूजे गलियारां का
तेरे तिरछे इशारयां का भेद आज बताउंगी।।
दूसरा झूठ अलकायदा की इराक गेल्यां यारी का
कोए सबूत पाया कोण्या तेरी झूठी होशियारी का
तेल की बीमारी का राज सबनै समझाउंगी।।
तीजा झूठ तेरा जालिम बताया आज सद्दाम तनै
तख्ता पलट के तरीवेफ सोचे घटिया तमाम तनै
खुलवाई सै लगाम तनै चाबुक तेरै लगाउंगी।।
मानवता का बैरी सै तूं इसका मनै बेरा बताउं
ना अपणी बुराई देखै सद्दाम कै दिया घेरा बताउं
सारा कसूर तेरा दिखाउं रणबीर पै लिखवाउंगी।।
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