शनिवार, 8 मार्च 2025

किस्सा चंपा चमेली

किस्सा

चम्पा चमेली












लेखक : 

रणवीर सिंह




भावी प्रकाशन


किस्सा सफदर हाशमी

जलियां वाला बाग

रानी लक्ष्मी बाई

भूरा निगाहिया

फूल कमल

अण्डी सद्दाम

फौजी किसान










प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स, ए-21 झिलमिल इंडस्ट्रिएल एरिया, जी० टी० रोड, शाहदरा, दिल्ली-95 से मुद्रित.
वार्ता:
किसान को अन्नदात्ता कहते हैं। परन्तु उसके परिवार की, उसके बाल बच्चों की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। फौज के दरवाजे भी कमोबेश बन्द हो चुके हैं। मेहनतकश की आवाज को सुनकर भी अनसुनी कर दिया जाता है। संस्कृति के नाम पर राजे रानियों के किस्से सुनाए जाते हैं। उसकी अपनी रानी, अपनी घरवाली के साथ क्या गुजरती है, यह बहुत कम गाया जाता है। औरत का चित्रण भी बड़े अजीब ढंग से किया जाता है। एक किसान को घरवाली चमेली व फौजी की पत्नी चम्पा, दो सहेलियों की रोजमर्रा की जिन्दगी पर लिखा गया है, यह महज चम्पा चमेली का किस्सा नहीं है बल्कि अपनी तमाम प्रतिबध्दता और ईमानदारी के बावजूद महिला 45 वर्षों बाद भी मुख्यधारा में नहीं आ पायी, इस सवाल का जवाब उन सभी को खोजना होगा जिन्हें महिलाओं की स्थिति का अंदाजा है। नारी हिमायतियों द्वारा शोषण का मुद्दा शोषण के विभिन्न उपायों से कन्नी काट कर प्रस्तुत किया है। और इस बात पर जोर दिया है कि समाज में शोषण के विभिन्न स्वरूपों के रहते नारी का पृथक रूप से शोषण मुक्त होना संभव नहीं है। यूं तो हमारे समाज में अनेक ऐसे महिला वर्ग है जो संख्या और प्रभाव में खासे बड़े हैं पर वे एक भूमिका के लिए संगठित हुए हो ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। खैर मेरा तो यह पहला प्रयास है। सही-गलत का फैसला जनता के दरबार में होगा। आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि : 
1
किसे और की कहाणी कोण्या, इसमें राजा राणी कोण्या सै अपणी बात बिराणी कोण्या, थोड़ा दिल नै थाम लियो ॥ यारी घोड़े घास की भाई, चलै ना दुनिया कहती आई बाहूं और बोऊं खेत में, बालक रूलते मेरे रेत मैं भरतो मरती मेरी सेत मैं, मत अन्नदाता का नाम दियो । हमनै मण्डी जमकै लूटै, म्हंगाई म्हारे जिगर नै चूटै लुटै मेहनत आज किसान की, गई फूट आंख भगवान की तिजौरी भरै शैतान की, देख सभी का काम लियो । चवालीस साल की आजादी मैं, कसर रही ना बरबादी मैं म्हारे बालक सैं बिना पढ़ाई, बचपन में मरें बिना दवाई कड़ै गई म्हारी कष्ट कमाई, झूठी होतै लगाम दियो । शेर बकरी का मेल नहीं घणी चालै धक्का पेल नहीं आप्पा मारें पार पड़ेगी धीरे, मेहनतकश रूपी जितने हीरे बजावैं मिलकै ढोल मंजीरे, रणबीर सिंह का सलाम लियो । 

रणवीर सिंह

किस्सा चम्पा-चमेली
वार्ता:
करमपुर गांव में रिसाल सिंह व मामचन्द फौजी रहते हैं। रिसाल सिंह के पास तीन एकड जमीन है। फोजी के पास भी दो एकड़ जमीन है। दोनों हम उमर हैं। बचपन साथ साथ बीता है। दोनों परिवारों का अच्छा मेल जोल है। रिसाल सिंह की माली हालत काफी कमजोर है। घरवाली पर ही गुस्सा निकलता है रिसाल सिंह की घरवाली चमेली काफी उदास रहती है। मामचन्द की घरवाली चम्पा, चमेली की पककी सहेली है। चम्पा रिसाल सिंह के चमेली के प्रति व्यवहार को लेकर बहुत चिन्तित रहती है। एक दिन चम्पा अपनी सहेली से दिल की बात करती है और पूछती है— 

चम्पा का सवाल

तर्ज - रिम झिम बरसता सावन होगा -

रागनी 1

क्यों उसकी घर मैं मेर नहीं मनै साची आज बतादे नै ।

क्यों तनै खावण नै आव से असली राज बतादे नैं ।। 


क्यों चेहरा काला पडग्या ना दीखे खून बदन मैं हे उभाणे पायां क्यों हांडै ओ देरया ज्यान विघन मैं हे होठ सूकगे क्यों उसके अर पाट्‌या कुड़ता तन मैं हे क्यों इसा सूका पतझड़ छार्या बेबे थारे चमन मैं हे क्यों उसने चौबीस घण्टे की भाजम भाज बतादे नै । 


के किसे नै झूठा लाया खोट थारे पं बेबे हे के करग्या कोए धोखा लेग्या नोट थारे पै बेबे हे के कोए जुल्मी नेता लेग्या बोट थारे पै बेबे हे के कोए पुराना दुश्मन देग्या चोट थारे पै बेबे हे क्यों झपर्ट चिड़िया के ऊपर जुलमी बाज बतादे ने ।। 


क्यों अनपढ़ बालक सारे ना आसंग ईब पढ़ाणे की थारी कष्ट कमाई क्यों नहीं घर थारे मैं पाणे की

नारी शोषण और अत्याचारों को लेकर अनेक संगठन व व्यवसायिक घराने अपनी दुकान चला रहे हैं। महिलाओं के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं बाजार में आ रही हैं। मनग किस्से व रसभरी कहानियां छापकर ये पत्र-पत्रिकाएं अपनी बिक्री बढ़ाने के कोशिश कर रही है। इनकी सोच के अनुसार महिलाओं को फैशन, व्यंजन व रसभरी कहानियों/ किस्सों की आवश्यकता है। इस दौड़ में सरकारी माध्यम भी पीछे नहीं है। दूरदर्शन पर औरत का चीरहरण कर दिया है। जाहिर है कि महिलाओं के हितों को लेकर जो प्रयास चल रहे हैं, वे कारगर सिद्ध नहीं हो रहे हैं जब तक गरीब व निम्न वर्ग की औरतों को शिक्षित नहीं बनाया जायेगा तब तक वे दकियानूसी विचारों, रूढ़ियों को तोड़ कर सुख की सांस नहीं ले सकती। मेरी यह पुस्तक उन जुझारू महिलाओं को समर्पित है जिन्होने समाज परिवर्तन के लिए अपना बलिदान दिया। 










आवरण छाया कार        : अजय वर्मा 

रूप सज्जा   : साहिब, सुभाष 

कापी राईट   : सर्वाधिकार सुरक्षित है 

मुद्रक   : क्रियेटिव आर्ट कम्यूनिकेशन, 199/20, 

नजदीक इंडियन बैंक रोहतक-124001


 


क्यों नहीं बचता धेल्ला सुध कोण्या से बालक याणे की क्यों कमनू सा हांडे जा नहीं सोधी पीणे खाणे की क्यों रहै भूखा रोज कमेरा असल इलाज बतादे नै ।।
 कितने दिन न्यों चालैगा जो हुआ था इकरार थारा कड़े ताहि चालैगा न्यों यो घर और परिवार थारा करले तू' किर्म जतन चमेली टूट चल्या घरबार थारा पड़े रणबीर सिंह धौरै जाणा जिब होगा उद्धार थारा बरोने मैं फिलहाल पिछोड़े ऐसा छाज बतादे नै ।। 


वार्ता - चमेली इतनी सुण के चम्पा के कान्यै सिर घरकै रोवण लागी । पर आंसु पीगी । बात बदल के उसने पूछया- तेरा फौजी कद छुट्टी बावैगा । फागण का म्हिना बी जाण नै होरया से। चम्पा की दुखती रग पै पां टैक दिया जणों चमेली नै । लाम्बी सी सांस भरी पहलम तो फेर बोली ए भाण बूझै मतना कई वै तो फोजी इतनी कसूती बाट दिखावे से अक के बताऊं चम्पा अपने आप नै रोक नहीं पाई: के कहण लागी चमेली ताहि : -

कहण चम्पा का

तर्ज: सिर पै धरया पाप का भार

रागनी 2

मेरा फागन करै मखौल, मनै पाट्या कोण्या तोल

हे क्यों करदी उसने बोल, कोन्या गेरी चिठ्ठी खोल

पता ना क्यों छुट्टी मैं रोल, देखें बाट सांझ तड़कै, 

आज्या तावल करके ।

आई फसल पकाई पै है, जासै दुनिया लाई पै हे 

मेरै लागे दिल पे चोट, बतादे मैं क्यूकर ल्यू ओट

मेरा कौणसा से खोट, सोचू रोज एकली लोट

म्हारी सारस बरगी जोट, ओ कित सोया पड़कै

आज्या तावल करके ॥

पता ना इसी के हुई नौकरी, कुण अड़चन उनै रोकरी

अमीरां के त्यौहार धणे, म्हारे तो से एकाध बणे


(2)

खेलें रल के सभी जणे, बाल्टी लेकै मरद ठणे 

देख के मेरे रूग तणे, औली आंख मेरी फड़कै, 

आज्या तावल करकै ।। 

मारै कोलड़े आंख मींच के, खेलें फागण जाड़ भींच के

उड़े आया सारा गाम, पड़े से थोड़ा थोड़ा घाम 

घरे पानी के भरे ड्राम, रणवीर सिंह ने दिया सलाम 

मनै लिया कोलड़ा थाम, मारया आया जो जड़कै 

आज्या तावल करकै ।। 

बार्ता - चमेली के परिवार का अधिक संकट बढ़ता चला गया । म्हंगाई की मार हृद तै बाहर होगी। कई बार झगड़ा होज्या था । एक दिन चमेली ने अपने पति रिसाल सिंह से सवाल करया-न्यों तो पार कोण्या पर्छ ? रोज रोज के झगड़े का कदे अन्त होगा अक नहीं? कद घर की राड़ खत्म होगी? कद म्हारे बालक बी पढ़ लिख के अफसर बनेंगे? रिसाल सिह चुप रहया। चमेली और घणी परेशान होगी और रिसाल सिंह से पूछने लगी -

सवाल चमेली का

तर्ज : ये मर्द बड़े वे दर्द बड़े (झोंका)

रागनी 3

ना रहै ठगी चोरी जारी औ दिन कद आवैगा । 

मार पिटाई बन्द हो सारी औ दिन कद आवैंगा ।। 


रोटी कपड़ा किताब कापी नहीं घाट दिखाई देंगे 

चेहरे की त्यौरी मिटज्यां सब ठाठ दिखाई देंगे 

काम करण के घण्टे पूरे आठ दिखाई देंगे 

म्हारे बालक वणे हुये मुल्को लाठ दिखाई देंगे 

कूकै कोयल बागां मैं प्यारी औ दिन कद आवैगा ।। 


दूध दही का खाणा हो बालकां नै मौज रहैगी 

छोरी मां बापां नै फेर कति ना बोझ रहैगी 

तांगा तुलसो नहीं रहै दिवाली सी रोज रहैगी 

बढ़िया व्यौहार होज्यागा ना सिर पे फौज रहैगी 

ना हो औरत नै लाचारी श्रो दिन कद आवँगा ।। 

(3)

बुलफा चरस फीम का ना कोए भी अमली पावै 

माणस डांगर नहीं रहै ना कोए जंगली पावै 

पीस्सा ईमान नहीं रहै ना कोए नकली पावै 

दान दहेज करकै नै दुख ना कोए बबली पावै 

हौवें बराबर नर और नारी औ दिन कद आवैगा ।। 


माणस के गल नै माणस नहीं कदे बी काटेगा 

गाम बरोना रणबीर का असली सुर नै छांटैगा 

लिख कै बात चमेली की सब दुख सुख नै बांटैगा 

बोहे पापी होगा जो इसा सुणनै तै नाटैगा 

राड़ खत्म हो म्हारी थारी औ दिन कद आवैगा । 


वार्ता-चमेली की बात सुणकै रिसाल सिंह का दिल थोड़ा सा पसीज्या। बात कुछ समझ में आई। बोल्या हांडी का छोह बरोली पै सवा ए वै उतरता आया चमेली। फेर पार तो कोण बसान्दी। बीमारी की जड़ पकड़ मैं ए नही बाली। रिसाल सिह जवाब देता है। 

जवाब रिसाल सिंह का

तर्ज : आल्हा

रागनी 4

सुण ध्यान लगाकै बात या पार हमारी जाणी ना । 

व्यवस्था माई हुई हड़खाई काट्या मांगे पाणी ना ।। 


म्हंगाई की मार कसूती बस भाड़ा और बढ़ा दिया

भंगड़ा जुगनी भुला दिये मन मैं मन्दिर चढ़ा दिया 

जलूस म्हारा कढ़ा दिया हमनै चाल पिछाणी ना । 


किसान और मजदूर गरीब सब फूट डाल कै बांट दिए 

क्यूकर भरै उडारी जड़ तै पर मैना के काट दिए 

बरोने मैं तो नाट लिये कति मानी उनकी बाणी ना ।। 


जूती म्हारी सिर भी म्हारा अमीर कसूती मार करे 

अपणा मारै छां मैं गेरै घणा झूठा प्रचार करै 

दूर बैठ के वार करें या म्हारी समझ मैं आणी ना ॥ 

(4)

चमेली सुण ले पांच साल मैं भेड़ की ऊन तराई हो 

नहीं सम्भाल होवै रणबीर की क्यूकर ईव समाई हो 

न्यों म्हारी चीज पराई हो या रूकती कुण्बा घाणी ना ।। 


वार्ता - रिसाल सिंह चमेली को बताता है- मैं के तेरी गैल्यां खां पाड करकै सुख पाऊ सू? पर के करू टोटे के म्हां गोड्डे भिड़ते हार्ड से म्हारे बरग्यां के। जिसी किस्मत मैं लिख राखो से उसी ए भुगतनी पड़ेगी । चमेली अचरज से मैं बोली---फेर म्हारी ए किस्मत मोटी कलम तै क्यों लिख दी राम जी नै । मेहनत करके खांवा सां। किसे के चोरी करते ना. डाका मारते ना, रिश्वत लेते ना, फेर म्हारे घर ते खाली अर चोरां के घर राम जी क्यों भरै से ? यों कितका न्या से ? इतनी सुण के रिसाल सिह फेर छोह मैं आग्या - तेरे ताडि के बर कहली अक तू आगे तै मतना बोल्या कर। न्यों कहकै बुल्धां की सान्नी भेण चाल्या गया। चमेली की बात का जवाब ऊंकै घोरै नहीं था। चमेली भी बन सा मारकै बर्तन मांजण लागगी। 


दोहा : किस्मत के ऊपर सवाल कोए ठाणा ना चाहिए । 

गरीबी अमीरी किस्मत करकै दूजा गाणा ना चाहिए ।। 


वार्ता- रिसाल सिंह सोचता है कि कदे रामजी साचेए तो म्हारी गेल दुमांत नहीं करर्या से ? फेर यकीन सा नहीं आया। सोच्या रामजी को मेरी गेल्यां के दुश्मनी से ? अर जिस दिन राम जी दुभांत करण लागज्यागा, उस दिन फेर के रहज्यागा ? चमेली बर्तन मांज कै पाणी भरण चाली गई । 


दोहा : ठाकै दोघड़ पहर लीतरे चमेली नलके पै आगी । 

गाल मैं चलती न्यों सोचे या दुनिया कित जागी ।। 


वार्ता - चम्पा चमेली तथा तीन सखियां नलके पर पानी भरण पहुंचणी । चम्पा बताती है कि फौज मैं लड़ाई छिड़ण नै होरी से। दूसरी सहेली पूछती है -तनै के बेरा ? तेरे घोरै के फौजी का तार आया से? सभी खिल खिला कर हंसने लगती हैं। नलके अभी आये नही हैं। सब अपने-२ घर की चर्चा करने लगती हैं। तरह तरह की बातचीत होती हैं। 
सखियों की बातचीत
तर्ज : डाल डाल पर सोने की चिड़िया
रागनी 5
पांच बहू नल के ऊपर आपस मैं बतलाई । 
बारी बारी जिकर करया बढ़ चढ़ कै बात सुनाई ।। 
चमेली नै मटका धरकै फरे खुल के बात बताई 
माथै हाथ मारकै बोली मैं हाली गेल्यां ब्याही 
सोतै काम तै उल्टा आवै धन्धे नै रेल बनाई 
तीज त्यौहार भूल गये सामण की पींग झुलाई 
खेतां मैं लीतर घिसगे मैं क्यूकर करू समाई ।। 
सन्तरा नै सुणकै सारी फेर अपना नाक चढ़ाया
न्यों बोली पति मेरे नै सब चीजां का ढू लाया 
ओवर सीयर होकै बी उनै पीस्सा बहोत कमाया 
रूंढ़ी झोटी ल्याकै बांधी कर दिया मन का चाहया 
इन सबनै के चाटू परनारी पं नीत डिगाई ।। 
तीजी बहू न्यों बोली मेरा पति न्यारा कर दिया 
दोनों एम ए करकै बैठे जी म्हारा कति भर लिया 
दोनां का सै हाल बुरा चा म्हारा सारा मर लिया 
गोली खा हो ज्यान खपाणी इतना म्हारे जर लिया 
इस कंगाली नै मेरी ये सारी टूम बिकाई ।। 
छन्नो बोली इसा सुधा सै कोण्या थारै भाण जंचे 
दिन रात के धन्धे तै ग्यारा बजे सी ज्याण बचै 
सो परपंच म्हारे घर मैं सासू मेरी ल्याण रचे 
झूठी बांता के कारण पति की गेल्यां आण खिचे 
सास बहू घणी दुखी हम दोनों टोही चाहवं दवाई ।। 
सुणकै सबकी बात चम्पा नै दोघड़ अपनी ठाई 
बोली सारी भाण दुखी सां ना सुखिया कोए पाई 
कोए कहरी किस्मत कोए करमां की कहै लिखाई 
मिलकै सोचो कष्ट निवारण रणबीर नै समझाई 
सदियां तै म्हारी जात बीर की गई स घणी दबाई ।। 


वार्ता - रिसाल सिंह का गुजारा नहीं होता। सोसाइटी से कर्ज लेना पड़ता है। सैकटरी की ऊपर तक पहुंच थी। मन्त्री का ब्बास माणस था । चौबीस घण्टे दारू मैं धुत्त रहता था। और बी कई ऐब बतावें थे उसमें। कर्ज का तकाजा करण संकटरी कई बर आ लिया था। भई मजाक करता था। उस दिन भी दारू पीकर बाया था। चमेली उसकी बातों का मतलब समझगी। उसने कहुया बरू ओ घरां कोण्या । जब औ घरां हो जिब आइये । सांझ नै रिसालसिंह चव घरां आया तो बमेली बताती है । 

कहण पति से

तर्ज : कस्में वायदे प्यार वफा ये बातें हैं बातों का क्या -

रागनी 6

सोसाटी आला बाबू जी रोजाना फेरी मारै सै 

दारू पीकै घरने आनै कुबध करण की धारै रौ ।। 


म्हारे घर अन्न वस्त्र का टोटा इतने जतन करें पिया 

म्हारी जिन्दगी बीत गई हम टोटे के म्हां मरैं पिया 

लत्ता कपड़ा नहीं ओढ़ण नै जाड़े के म्हां ठिरै पिया 

बता जुल्मी करजे का पेटा किस तरियां तै भरै पिया 

इस करजे की चिन्ता मनै शाम सबेरी मारै सै ।। 


धरती सारी गहने घरदी दवा लिये करजे नै 

जितने जेवर थे घर मैं सब बिका दिये करजे नै 

म्हारे कान्धे आज तले नै झुका दिये करजे नै 

रोटी कपड़े के मोहताज हम बना दिये करजे नै 

सोसाटी आला बाबू जी ईज्जत पै हाथ पसारै से ।। 


जहरी नाग फण ठारे कुएं जोहड़ मैं पड़ना दीखे 

क्यों नहीं गुजारा चलै ज्यान का गाला करना दीखें 

करजा म्हारा नाश करैगा दुख घणा भरना दीखे 

मारू सैकटरी नाश जले नै ना आप्पै मरना दीखें 

आंख मूं'दगे हीजड़े होगे ओ गाम नै ललकारं से ।। 

(7)

गरीब की बहू जोरू सबकी समझे दुनिया सारी 

मेहनत तै लूट लई म्हारी ईज्जत लूटण की तैयारी 

सारा गाम बिलखै पिया कड़े गया कृष्ण मुरारी 

रणबीर सिंह बरोने मैं बताने खोल या बेमारी 

करियो ख्याल तावले सारे चमेली खड़ी पुकार सै ॥  
**

वार्ता - रिसाल सिंह चमेली की बात सुनकर आग बबुला हो जाता है। सैक्टरी की इतनी मजाल। जेली ठाकै चाल पड़या हिसाब बराबर करण । घर-वाली रिसाल सिंह के पायां पड़ जाती है और कहती है- 10 हजार कर्ज ले राख्या उसका के बनैगा ? रिसाल सिंह कहता है देखी जागी। जेल काट ल्यांगे । पर म्यों तहलैंडू रहकै कितने दिन जीवांगे? सैक्टरी रमले की पोली मैं बैठ्या था। दो पहलवान भी उसके घोरै बैठे थे। ताश खेलण लागरे थे। रिसाले के तन-बदन में आग लागगी। बोल चुप्पाके नै सीधा जाकै दोनू वांह सम्हां के सैक्टरी के जेली लाठी की ढाल मारी कड़ मैं। दोनू पहलवान तै बांड टोहे भी ना पाये । लोगां नै बीच बचाव करा दिया। सैक्टरी नै माफी मांगी। पर भीतरै भीतर जल के राख होग्या। सारे गाम में चरचा होग्या। जितने मुंह उतनी ए बात । कोए सैक्टरी का कसूर बतावै अर कोए चमेली का। चमेली का राह चालना मुश्किल कर दिया । एक दिन तीन-चार पुलिस आले आये अर रिसाल सिंह ने थाने में पकड़ कै लेगे। थाने में बुरी बनी उसके साथ । 
थाने में दो रात
तर्ज : हो दूर जाने वाले कोई रास्ता बतादे
रागनी 7
हथकड़ी पुलिस नै रिसाल सिंह कै आण चाणचक लाई ।। 
किवाड़ां पाछे खड़ी चमेली ना उसकी पार बसाई ।।
थाने के म्हां करी मंजाई कोए कसूर बताया ना 
दो दिन राख्या थाने के म्हां परचा कोए बनाया ना 
कागजां मैं दरज पाया ना चमेली धक्के खाकै आई ।। 
बड्डे चौधरी गाम के जितने मार गये दड़ सारे 
मन्त्री का डर सबनै लागे जितने मितर प्यारे 
चम्पा चमेली ना होंसला हारे ना पुलिस तै दहशत खाई ।।
पिट छित के उल्टा आग्या घेला एक दिया कोण्या 
अपने मन मैं धार लिया सैक्टरी माफ किया कोण्या 
ऊतां का संग लिया कोन्या रणबीर की यारी चाही ।। 
संगठन करकै लड़ा  लड़ाई ना ताकत बर्बाद 
करॉ 
नई जिंदगी अपनी आजाद करॉ इब ना होवै म्हारे समाई।।

++

वार्ता - थाने से वापिस आने के बात चमेली रिसाल सिंह से पूछती है-बिमला के बाबू बता यो राम जो म्हार ए पाछे क्यों पड़ऱ्या से ? सांच ने आंच नहीं सुण्या करदे। फेर आज तो आंच से सोच नैं कहावत बणनी चाहिए। बद-फेली करें अर ऊपर तें सीना जोरी। रिसाल सिंह कहता है बस बिमला की मां बूझे ना। जी तै इसा करें से अक सब क्यांहे कै आग लाकै भस्म करदयू पर ये चोर बदमाश अर काले बजारिये तो फेर भी बचे रहज्यांगे । 
दौहा : राम जी के भगत दोनों हाथ जोड़ फरियाद करें । 
साथ निभा कृष्ण मुरारी सैक्टरी हमने बरबाद करें ।। 

वार्ता - एक दिन रिसाल सिह से उसका दोस्त नफे सिह पृश्यता है- भाई घरां किमै तकरार तो नहीं चालरी' सूकता क्यों आवै सै ? रिसाल सिंह बोल्या-ना तकरार तो किमै ना नफे फेर बोल्या ताप तूप आवै था ? रिसाल बोल्या-ना नफे सिह नै ठाडू बोल मैं बूझ्या तो फेर के सूई खाग्या, बतान्दा कोन्या के मरज से यार के ? रिसाल सिंह ने जवाब दिया मैं तो म्हंगाई नैं खा लिया जमा नफे सिह बोल्या म्हंगाई तो सबनै सेधै से। न्यों कहै नै अक घरआली नाज डिगादे से । रिसाल सिंह बोल्या र उसका तो तर्ने बेरा ए सै। इसी बातां के घोरै के बी ना जान्ती चमेली। नफे सिह नै बूझ्या तो के बात से ? रिसाल सिह उसे समझाता है ।  
जवाब रिसाल सिह का
तर्ज : फूल तुम्हें भेजा खत में
रागनी 8

म्हंगाई नै काल कर्या मैं बहुत घरणा दुखी पारया सू' । 
बीर मेरी तै हीरा से रल मिल के बात बणारया सूः ॥ 
बरते बिना तो भले खोटे का कोण्या बेरा पटता 
भीरू माणस मोक मारज्या सच्चे का सिर कटता 
गण्डा पैदा करै रिसाला मौज क्यों साहू खटता 
गाम राम मैं माणस छिदा अपणी आण पै डटता 
लाख टके की बात खरी से मुफ्त मैं आज सुणारया सू' ।। 
सहनशील गुणवन्ती मिलगी अकलमन्द और स्याणी 
चेहरा देख मनै म्यों लागै जणू हो झांसी की राणी 
उस गेल्यां रल मिल काटूं मनै पड़ी बिपता ठाणी 
बहोत घणा सबर उसमें नहीं चमेली जमा अंघाणी 
इसो मिली मनै नार नफे तनै सही बतारया सूं ।। 
मैले लत्ते पहर रही जण बादल में सूरज ल्हुकण्या 
घाम पड़े लू चालै उसका हाथ कसोले पै झुकरया 
हुई बेहाल पसीने मैं तर जी ढाठे के मैं घुटरया 
ऊपर तै यो काम कसाई तल्लै रेत्ता बालू फुकरया 
मैं लाचार खड़या डोले पै उसकी तरफ लखारया सूं ।। 
मैं कहूं मत लड़े बहू तै मां लोग हंसाई हो ज्यागी 
माँ बोली चुप रहज्या ना तो घणी लड़ाई हो ज्यागी 
सोना कहै रांग नै क्यूकर मेरै समाई हो ज्यागी 
के न्यों बिसराये तै नफे पाणी में काई हो ज्यागी 
कदे रोकै कदे हंसकै मैं जिन्दगी की तान बजारया सूं । 
ना रोकी ना टोकी कदे ना मन्दा बोल्या चाल्या 
बीर समझ कै मरद पने का रोब कदे ना डाल्या 
गैर बीर नहीं कदे निगाही ना मेरा हिया हाल्या 
क्यों म्हारा पूरा पटता ना मैं इस चिन्ता नै साल्या 
रणबीर किसी कविताई से मैं अपणा दुखड़ा गारया सूं ॥ 


वार्ता - रिसाल सिह नफे सिह की बात चमेली ने बतावै से। चमेली को दुख तो बहुत आता है पर खुश भी हो से बक रिसाल सिंह के दिल में उसने द्वारे मैं बढ़िया भावना से । 

दोहा : 
 रल मिल के कर गुजारा नहीं हो तकरार कभी।
बुरे दिन और हैं बाकी रहना हो तैयार अभी ।

वार्ता - चम्पा एक दिन चमेली के पास आती है और चिट्ठी लिखने को कहती है। चम्पा है तो अनपढ़ पर दिल की बहुत अच्छी है कहने लगी- फागण गया, चैत गया, ईब बसाख भी जाण लागऱ्या से। बालक बीमार से। दो चिट्ठी पहलम लिखवाली पर कोए बेरा नहीं बाया। ईब के सख्त व सक्त चिट्ठी विश्वये । चम्पा मोटी मोटी बात बता देती है। 
चम्पा की पुकार
तर्ज : घड़ी मिलन की आई
रागनी 9
जै उड़े रोटी खावै पिया आड़े आकै पिये पाणी।
मींह बरगी तेरी बाट पिया गेरै चिट्ठी तेरी राणी ।
तनै बताऊ इस घर मैं मनै दीखे घोर अन्धेरा हो 
बरोने मैं पिया जी पड्या सै तेरा सूना डेरा हो 
घर मैं तंगी याद तेरी और दिया ताप नै घेरा हो 
तनै हो लिया पूरा डेढ़ साल ना लाया इब तक फेरा हो 
बेमार पड़ी कई दिन तै होती दीखै कुण्बा घाणी
थी फूलां मैं तोलण जोगी होया नाश शरीर का हो 
बहता पानी गुणकारी बणै कुछ ना खड़े नीर का हो 
दिल घबरावै मेरा भरोसा ना तकदीर का हो 
ताने मारै दुनिया जणू निशाना तीर का हो 
बालक रोवं पायतां बैठे उमर से इनकी याणी ।।
थोड़ी लिखी नै घणी मानिये हाथ जोड़ के कहण मेरा 
सुसरा मेरा गाली दे दे करदे मुश्किल रहण मेरा 
इसतै आच्छा तो पिया जी आर्क करदे दहण मेरा 
घणे दिन ओटी ईव कति दिल करता कोन्या सहण मेरा 
बख्त पे आण सम्भाल लिये कदे होज्या लाश उठाणी ॥ 
भूल गये वो बाग बगीचे थी कोयल की कूक जड़ै 
भूल गये वे राग रसीले लखमीचन्द की हुक जड़ै
भूल गए वे स्कूल मदरसे पढ़ाई की थी भूख जड़ै  
कौल करार भूल गए वे आपस की रसूक जड़ै 
रणबीर तै बूझू जाकै हो कित अरजी ले ज्याणी ।। 


वाताँ—चिट्ठी लिख कर चम्पा को दे देती है। चम्पा चिठ्ठी की तरफ खाली नजरों से देखते हुए अपने घर की तरफ चल पड़ी। लाम्बी सांस खीच के लोचण लागी-मैं भी पढ़ लिख लेती तो ? ख्यालों में खो जाती है चम्पा । 
चम्पा का सोचना
रागनी 10
मैं लिखी पढ़ी होती तै दिल खोल तनै दिखा देती । 
लिखकै सारी बात पिया जी तत्काल तनै बुला लेती ।। 
बचपन मैं पढ़ नहीं पाई मनै भाई खूब खिलाया था 
मां बाबू अनपढ़ मेरे नहीं रस्ता स्कूल दिखाया था 
गोबर पाथना खूब सिखाया था जड़ मैं भाई बिठा लेती । 
छोरी का पढ़ना ठीक नहीं बस इतना ही सुण्या हमने 
दुख सुख किस्मत करकै इसा ए नक्शा बुण्या हमनै 
नहीं खुद रस्ता चुण्या हमनै भाभी दो बात सिखा देती । 
देखते देखते म्हारे साहमी यो बख्त पुराना बदल गया 
नए तौर तरीके खोज लिए साइंस का बढ़ दखल गया 
ईव मनुष्य हो सफल गया साइस मरते नै जिला देती । 
मेरी पार बसावै पिया तो विद्या पढ़ज्यां सारी नै 
डर लागे दुनिया के कहवै लग्या राम बुढ़ियारी नै 
रणबीर सिह से लिखारी ने लिख के बोल हिला देती । 

वार्ता- चिठ्ठी के बाद चम्पा का घरवाला दो हफ्ते की छुट्टी आग्या। चम्पा की हालत सुधर रही है। चमेली एक दिन हाल चाल पूछने आती है। फौजी भी वहीं पर है। फौज की जिन्दगी के बारे में बातचीत होती हैं। फौजी बताता है-ईब पहल्यां आली बात कड़े से फौज मैं भी। वह चमेली के घर के बारे में पूछता है। चमेली का धन्यवाद भी करता है कि चम्पा की चिट्ठियां वह लिख देती है। 
दोहा : 
 तेरे बिना नहीं चालै काम तेरी सहेली का । 
फौजी कोन्या भूलै चढ्या जो शान चमेली का। 
वार्ता - चमेली कै तो टोटे की खटक कसूती लागरी थी। बोली- ए' बो दियाल कोट मैं भी इतनी ए म्हंगाई से के इन वार्ता की चरचा फौज में नहीं चालती ? मामचन्द बताता है कि घणहरे फौजी इसी चिन्ता में रहते हैं कि के बर्णगा ? चमेली फौजी से पूछती है। 
सवाल चमेली का
तर्ज : आपकी इनायते आपकी
रागनी 11
अन्न वस्त्र का टोटा घर मैं इतने जतन करें फौजी । 
सारी जिन्दगी बीत गई हम टोटे बीच मरै फौजी ।। 
टोटा खोटा दुनिया के मां इस टोटे कै लिहाज नहीं 
म्हारे जिसे मोहताजां की कम दुनिया मैं तादाद नहीं 
कितना दुख बाकी बचरया से इसका जमा अन्दाज नहीं 
दूध मलाई किततै आवै खावण खातर नाज नहीं 
लत्ता कपड़ा ना ओढ़ण नै जाड़े बीच ठिरै फौजी ।
चोर जार ठग मौज उड़ावै गरीब रहें दुख भरते 
सै बदमाशां की चान्दी सांचे फिर गुलामी करते 
तिजौरी भरी अमीरां की गरीब भूख मैं मरते 
मेहनतकश की लूट कमाई अमीर मौज मैं फिरते 
क्यों बालक म्हारे गालां के मैं हुए उदास फिरें फौजी । 
कमा कमा के मर लिए हमने दिन और रात गिनी कोन्या 
टोटा आगे आगे चाल्या नफे की बात बनी कोन्या 
म्हारे ऊपर टोटा क्यों से या पल्ले मेरै घली कोन्या 
बालक बाट मिठाई की देखें चुल्हे आग जली कोन्या 
इतना सबर तो करया और ना ज्यादा घूट भरे फोजी । 
लहू चूस लिया सारे गात का घणा सताए टोटे नै 
घर बिगड़ण मैं कसर रही ना बिधन खिडाए टोटे ने 
किसी माया रच राखी ये जाल बिछाए टोटे नै 
इसे फंसाए बांध जूड़ लाचार बनाए टोटे नै 
कहै रणबीर बरोने आला क्यूकर पार तिर फौजी ।। 


वार्ता – मामचन्द चमेली को बताता है कि फौज में भी कई कमी बागी। दूर के ढ़ोल सुहावने लाँगे से। चरचा सारे से अक देश का के बर्णगा? के बदाब न्यारे न्यारे मिले से ।
दोहा : लोगों की सेवा की बजाए राजनीति बनी कपट का खेल। 
चोर बदमाश यहां बने चौधरी सच्चों को मिलती जेल   

वार्ता-मामचन्द फौजी की छुट्टी खत्म होगी। वापिस चालने की तैयारों करता है। चम्पा कुछ दिन और ठहर जाने का तकाजा करती हैं। मामवर कहता है-तने तो बेरा से चम्पा फोज की नौकरी का । बिना खास कारण हो नहीं बघवाई जा सकती । चम्पा कहती है कि घरवाली की बीमारी नै फोज बाह कारण नहीं मानती के ? चम्पा कहती है। 

दोहा । टेलीफून मिला अफसर तै फरियाद करिए हाथ जोड़ है। 
दस दिन की छुट्टी बधाद्यो कहिए फौजी मुह फोड़ कै ॥ 

वार्ता-दस दिन की छुट्टी भी खतम होने को आ गई चम्पा को बहुत खराब सपना आया। सरहद पे जणों लड़ाई छिड़गी फौजी की पलटन दुश्मनों से विर जाती है। फोजी लड़ाई में मारा जाता है। चम्पा फोजी को फिर कहती है-छो फौज की नौकरी। बाई ए खा कथा ल्यांगे सपने का जिकर करती है। 
सपने का हाल
तर्ज : डस गया नाग बरी
रागनी 12
दिख्या छलनी पड़या सरहद पे शरीर की नाड़ी छूट गई । 
रोती हांडू गालां के म्हा मेरी क्यों किस्मत फूट गई ।। 
तेरी पलटन कलकत्ते तै चल के आई थी पंजाब मैं 
लैफ्ट राइंट करता दीख्या थी ज्यादा अकड़ जनाब मैं 
पाकिस्तानी फौज दो आब मैं मेरा कालजा या चूट गई । 
हवाई जहाज बम्ब बरसावं उड़े दनादन गोली चाली 
पैटन टैंक दाग रहे गोले चोगरदं धरती हाली 
उड़ें धरती पै छाई लाली मैं पी सबर का छूट गई । 
पहल्यां कदे बी देखी नां इसी घमासान लड़ाई मनै 
माणस का बैरी माणस था देखी मची तबाही मनै 
तों ना दिया दिखाई मनै मेरी दुनिया जण लूट लई । 
थोड़ी हाण मैं मोर्चे पै तू आगै खड़ा दिखाई दिया 
करै बौछार एल एम जी स्याहमी पिया अड्या दिखाई दिया 
फेर रणबीर पड़या दिखाई दिया या नींद मेरो तो टूट गई। 


वार्ता-मामचन्द बोल्या-सपना साचो नहीं हुआ करै। चिन्ता मतना करिये । फौजी वापिस चला गया। चम्पा की ननद मिलकपुर में व्याही थी। ऊपर तै दीखण में सब बढ़िया चालरया था। पर भीतर भीतर गम्भीर पाकरी थी। खबर आई नक किताबो जल के मरगी। रोटी पोवै थी। स्टोव पाटण्या । आग लावगी मैडिकल में जाकै मरगी । चमेली चम्पा को उदास देखती है तो कारण पूछती है। चम्पा ननद के हादसे के बारे मैं बतावै से। चमली बोली-ए स्टोव तै नपूत्यां क था एना। पाट किततै गया ? 

तर्ज : दोवां म्हाते एक काम कर
रागनी 13

के बूझे से भाण चमेली सारा तो तनै बेरा है । 
देख देख इसी करतूतां नै विध्या कालजा मेरा है ।। 
नणद मारदी दिन घोली घणा बुरा जमाना आया 
स्टोव नपूते नै बी बेबे म्हारे कान्हीं मुंह बाया 
कोसली हो चाहे गोहाना घणा कसूता जुलम कमाया 
किस किस का जिकरा हे आज दुर्योधन बी शरमाया 
जली नहीं से गई जलाई न्यों छाया बाज अन्धेरा है । 
इस देश में छोरी पैदा होण पै सारै छा मुरदाई जा 
छोरे के उपर बाजै थाली घणीए खुशी मनाई जा 
जिसकै होवै लागती छोरी वा निरभाग बताई जा 
इसकी दोषी कहें बीर नै न्यों म्हारी आ करड़ाई जा 
म्हारी समझ मैं आया कोन्या यो विधनां का घेरा हे । 
मनू महाराज नै भाण चमेली कसूता अत्याचार करया 
लूंला लंगड़ा गंवार और कोढ़ी पति म्हारा स्वीकार करया 
नाड़ झुका और गूंगी बणकै हुकम हमें अंगीकार करया 
नाड़ उठाकै जो बोली कुल्टा जिसा ब्यौहार करया 
हमनै नागन कहै माणस क्यों चाहवै बण्या सपेरा है । 
पां की जूती बरोबर म्हारी क्यों तसबीर दिखाई जा 
राज करण की छोरयां तैं पूरी तदबीर बताई जा 
वीर नै गम खाणा चाहिए म्हारी तकदीर सिखाई जा 
म्हारै वासी खिचड़ी थ्यावै उननै हल्वा खीर खिलाई जा 

रणबीर सिंह ना झूठ लिखे से गाम बरोने डेरा हे

वार्ता - चमेली लाम्बी सी सांस भरकै बोली- चम्पा बात तै तू ठीक कहै से पर करां के ? कोए राहू गोण्डा तो नहीं दिखाई देता। अन्धेरा ए अन्धेरा दिखे से। कई में तो इसा जी कर से अक गोली खा के लाम्बी तान के सो ज्याक चम्पा बोली- ना बेबे इसी मना सोचिए । एक तै दो भले । मरना ए से तो कुछ करके मरना चाहिए। न्यों किसे के के अजार आवै से। 

दोहा : बिराणे भरोसे बैठ के म्हारा कदे उद्धार नहीं होने का । 
आपा मारें पार पड़ेगी पुकारै बच्चा बच्चा गाम बरोने का ।। 

वार्ता - दिन बीत रहे थे। एक दिन की बात है रिसाल सिद्ध के घर मैं उसकी लड़की बिमला अकेली थी। सैक्टरी अपणे चकरां मैं था। रिसाल सिह थाने में पिटवा के भी उसकी तसल्ली नहीं होई थी। उसने बेरा था अक बिमला अकेली है। घर पहुंच कर वह बिमला को फुसलाने की कोशिश करता है। 
सैक्टरी का कहना
तर्ज : कहकै उल्टा नहीं फिरूंगी

रागनी 14

करमां करकै विमला फेटी, क्यों वनरी तू इतनी ढ़ेठी, ना मैं चाचा ना तूं बेटी, करदे मन चाहया ।। 
आग क्यों ना कदम डालती, 
क्यों मेरी कही बात टालती 
चालती सांस दोखरी बड़ मैं, 
भरया रस केले केसी घड़ मैं 
आज्या बैठ पलंग पै जड़ मैं, हो आनन्द काया ।। 

मेरै छिड़ी से इश्क बिमारी, 
तेरी या खिलरी केसर क्यारी
 सारी उमर रहै दुख भरना,
गरीब बाप का लेरी सरना 
मान ले ब्याह मेरे लें करना, तेरी सब घन माया ।। 
होसै करे करम की लाग, 
ना समझेंगी तों निरभाग 
इसतै ज्यादा तोड़ नहीं से, 
तनै मरण नै ठोड़ नहीं से 
मेरै चिजां की ओड़ नहीं से, पाज्या सुख काया ।। 
गया हुआ वस्त हाथ ना आवै, 
दखे कदे तू' पाछे पछतावे 
बात पते की समझाऊ मैं, 
तेरे मेटना दुख चाहूं मैं 
रणबीर सिंह नै मरवाऊं मैं, उनै सत्यानाश कराया ।। 

वार्ता :बिमला सैक्टरी की चाल समझ जाती है। उसे एक बार तो बहुत डर लगता है। सेक्टरी उसे अन्दर की तरफ बुलाता है। बिमला बगड मै वही खड़ी होती है और कहती है में ईव सक्का दयू सुनाते बोल चुपचाप चाल्या जा चाचा। सैक्टरी फिर भी फुसलाने की कोशिश करता है तो बिमला क्या कहती है। 
जवाब बिमला का
तर्ज : एक प्रदेशी मेरा दिल ले गया

रागनी 15

देख एकली विमला नै क्यों लाग्या करण ग्रंघाई चाचा। 
करज लिया से हमनै ना ईज्जत गहन घरवाई चाचा ।। 
माणस होक डांगर की ज्यू मतना नीत डिगाईये 
मेरी आधी उमर तेरी अकल मारी तावला चाल्या जाइवे 
घणी वार मतना लाईए ईव होती नहीं समाई चाचा । 
फूल समझ के ना हाथ लगाइये कदे कांटा चुभज्या 
नीच काम से बहोत घणा यो नाम जगत मैं युकज्या 
पापी तू उल्टा ए डिगरज्या में समझ गई चतराई चाचा । 
आंख खोल ले होश मैं आज्या क्यों मरणा चाहवं से 
मनै देख पागल होग्या क्यों मनै वरणा चाहवै से 
क्यों कुकरम करणा चाहवं से होज्या तेरी पिटाई चाचा । 
मेरा ख्याल छोड़ चाल क्यों बीज बदी के बोबे हो 
इन्सानों के ये काम नहीं क्यों वृथा झगड़े झोने से 
रणबीर तनै टोहवं से संग बरोने की लुगाई चाचा । 


दोहा : तीर चलाये हाड़े खाये दाल उड़े गली कोण्या । 

विमला पक्की कोण्या कच्ची गेल उसकी रली कोण्या ॥

वार्ता -बिमला का रुख देखकर सैक्टरी वहां से भाग जाता है। पर बाते जाते धमकी दे जाता है कि यदि किसी को कुछ बताया तो बेड़े वे लाश पार्वणी बेरी किसे दिन । बपनी भलाई चाहवे से तो मेरी बात मान जाइये । 
दोहा : मन में डरें के करें बिमला सौर्च मन के म्हां । 
थर थर कांप गुस्सा आगे नहीं बाकी तन के म्हां ।। 

वार्ता – बिमला की मां बिमला को दो तीन दिन से उदास देख रही थी। कारण पूछती है। बिमला रो पड़ती है। चमेली को भी पक्का सा बगता है। कई तरां की बात मन में सोचती है फिर कहती है। 

दोहा : क्यों रोगे बेटी बिमला के तंग करै ऊत लु'गाड़ा । 
चुप होज्या मेरी जाई बता के हुया कोए पवाड़ा ।। 

वार्ता- डरती डरती विमला अपनी मां को सारी बात बता देती है। चमेली की आंखों के सामने अन्धेरा सा छा जाता है। रिसाल सिंह की थाने में पिटाई शेर सारी घटना उसकै साहमी बा खड़ी हो से। वेबस होकै चमेली बी रोण लागज्या से। इतनी वार में चम्पा आज्या से चमेली पहले तो बात को छिपाना चाहती है। कवारी छोरी का मामला से। पर चम्पा के सामी चमेली पहलम कदे कोए बात ल्यको पाई होते ईब रहको पान्ती। सुणर्क चम्पा कहती है। 

कहण चम्पा का
तर्ज : मेरा मन डोले मेरा तन डोले
रागनी 16

मरो कीड़े पड़कै, मेरै घणा कसूता रड़कै, क्यो कुवध करें से निरभाग, पड़े ईब खेलना खूनी फाग । 

उसकी गुण्डा गरदी बढ़गी ज्यान काढ़ ली म्हारी बेबे 
सफेद पोश बदमाश नै करी दुखी या जनता सारी बेवे 
कमला सरती घमलो रोवै ना बात एकली थारी बेबे
ना रहया गुजारा गरीवां का बादल संकट के भारी बेबे 
हमनै लड़ना हो जमकै अड़ना हो चिन्गारी वर्ण धधकती आग 
पड़े ईव खेलना खूनी फाग । 
बिमला जै चुप रहैगी तो यू सांड सैक्ट्री छूट ज्यागा 
जितनी बहू बेटी से गाम की भाग सबका फूट ज्यागा 
सजा मिले बिन ओ पापी सबकी ईज्जत नै लूट ज्यागा 
जवान गाभरू हुये होजड़े विश्वास म्हारा टूट ज्यागा 
हृया चुप भगवान दुखी हुया इन्सान तारां आप यो काला दाग 
पड़े ईव खेलना खूनी फाग । 
मेरै जरगी बाहण चमेली मुश्किल म्हारी पार पड़ेगी हे 
बिमला बेटी करो होंसला तेरी चाची त्यार लड़ेगी है 
एक को श्रागै होके चालां बीरों की लार अडंगी हे 
गाम संगठन बना करमपुर की या बहादर नार भिडंगी हे 
ते ताहवें ना भाज्या ध्याने उसके आज्या मूह में झाग 
पर्ड ईब खेलना खुनी फाग  । 
सारी भाणो सुणल्यो रोज म्हारी गेल्यां ऐसी बात वर्ण 
म्हारी आवरू तारण खातर या गुण्डयां की फौज फिरै 
कदे कोसली कदे काण्ड गोहाना ज्यान हमारी रोज घिरै 
झूठा पाखन्डी ढोंगी पापी आड़े जमकै मौज करै  
चालै जोर नहीं सभाई और नहीं रणवीर सिह गांव म्हारे राग 
पड़े ईब खेलना खूनी फाग  । 


वार्ता - चम्पा चमेली सलाह करके रिगाल सिंह को फिलहाल इस घटना का जिकर न करने का मन बना लेती हैं। चमेली का दिल पहली घटना नै पकर राख्या सै। भय भी से अर गुस्सा भी आवै है सैंक्टरी पै, पर पार भी कुछ नहीं बसान्ती । चम्पा पें उसने भरोसा से। उसकै आगे एक दिन दिल की भडांर काड़ से। चमेली कहती है। 
कहण चमेली का
तर्ज: उसकी करणी उसकै आगै जिकर करया ना करते
रागनी 17
चाला कर दिया उसने चम्पा भूल गया घरबार नै । 
बाकी कोण्या छोडी बेबे उस लुच्चे बदकार नै । 
खोटी कार करण नै क्यों खोटा ध्यान हो गया 
साफ नीयत ना राखी क्यों बेईमान हो गया 
कोए नहीं बोलता क्यों बियाबान हो गया 
छह म्हिने तै म्हारा घर शमशान हो गया 
कुबध करण की ठाणी उसनै भूलग्या सही विचार है। 
चाचा होके डूबण लाग्या कती शरम ना आई
इश्क नशे मैं टूहल गया पाप की राह अपनाई 
गलत सही नै भूलग्या चाही करनी उनै तबाही 
काम वासना डटी ना टोहली नाश करण की राही 
मींच लई क्यों आंख बता गरीबां के कृष्ण मुरार नै । 
भस्मासुर मरया था उसने उमा पै नीत डिगाई 
रावण का के हाल हुआ जिब जानकी उनै चुराई 
पाप पै आण मरया नारद जा मोहनी उन रिझाई 
कीचक का भी वध होग्या जा उन द्रोपदी ठाई 
इन्द्र जी भी रोया गेर अहिल्या ऊपर लार नै । 
भाण बेटी पै नीत डिगादे इसतै भूडा करम नहीं 
डूबग्या चाचा होकै रैहरी उसकै जमा घरम नहीं 
बदला जरूर लेवांगे सां इतने हम नरम नहीं 
नाश जले उस सैक्टरी के हम छोड्डांगे भरम नहीं 
रोज पिनागै रणबीर सिंह कलम रूपी तलवार नै ।

 

वार्ता - सैक्टरी की हरकतों से रिसाल सिंह दुखी है। बिमला बाली बात का उसे पता नहीं चलता पर कर्ज की चिन्ता और संक्टरी के फेरे उसके जी का जंजाल बणते जा रहे हैं। एक दिन रिसाल सिंह सोचता है कि कुण्बे में एक दादा है. उससे पीस्सा उधार लेकै सोसाटो का कर्ज तो तार द्यू। सैक्टरी के चक्कर तो बन्द हो ज्यांगे। दादा को रिसाल सिंह जाकर प्रार्थना करता है। 
कहण रिसाल सिह का
तर्ज : सावन का महिना पवन करे शोर

रागनी 18
रिसाला : मदद करो दादा जी मनै देकै करज उधारा 
दादा : पीस्सा उधार देण का ना से बेटा ब्योंत हमारा । 
रिसाला : ठीक नहीं से अड़ी भीड़ मैं अपणे ताहि ना करना 
दादा : बात गलत से औरे गैरे ते करजे ताहि हां करना 
रिसाला : चाहिये इस ढ़ाला ना करना करै क्यूकर गरीब गुजारा । 
दादा : लेण देण इसा चाहिये न्यों चालै ना साहूकारा । 
रिसाला : दादा मतना फरज भूल फंस के माया के जाल में 
दादा : धरती गहणैए धरदे तो करूं ना करजे की टाल मैं 
रिसाला : अमीरों के ताल मैं होसै गरीबों का निस्तारा । 
दादा : दादा के ख्याल मैं तेरे किसे लाखों ऊत आवारा । 
रिसाला : म्हारा थारा लेण देण घणे दिनां तै चलता आया 
दादा : जिब बख्त बदलज्या साथ साथ ब्यौहार बदलता आया 
रिसाला : चढ्‌या शिखर ढ़लता आया फेर माणस कोण बिचारा। 
दादा : ढलकै काया माया छाया नहीं आवै कदे दोबारा ॥ 


दोहा : हजारों लाखों किसान बिचारे करज बोझ तै बिलख रहे । 

साहूकार आज मौज करें माये ऊपर लगा तिलक रहे ।। 


वार्ता- रिसाल सिंह बहुत दुखी है। कई बार आत्म हत्या करने की सोचता है। पर फिर ख्याल आता है बिमला का, कमला का, शमशेर को इन बच्चों का क्या होगा ? सैक्टरी तो बसणैं कौनी दे चमेली नं। इसी बीच पचायत के चुनाव आ जाते हैं। नोट व दारू से वोट खरीदे जाते हैं। चमेली चम्पा सब देखती हैं। सैक्टरी बहुत भाग दौड़ में है। दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला है। एक बदमाश आदमी है, पीस्से आला है, संक्टरी उसकी मदद पैसे। दूसरा बादसी शरीफ से । ईमानदार से। चमेली एक दिन रिसाल को क्या कहती है ? 

सवाल चमेली का

तर्ज : मेरा मन डोले मेरा तन होने

रागनी 19

लेज्यां म्हारे वोट करें बुरी चोट आवै क्यों नींद रूखाले नै । 
घेर लिए मकड़ी के जाले में ।। 

जब पाछे सी भैंस खरीदी देखी थी धार काढ़ के हो 
जब पाछे सी बीज ल्याया देख्या था खूब हांड कै हो 
जब पाछे सी हैरो खरीदया देख्या था खूब चांड कै हो 
जब पाछे सी नारा ल्याया देख्या था खुड काढ़ के हो 
बोटां पै रोल पार्ट कोण्या तोल लावां मुंह लूटण आलै नै । 
घेर लिए मकड़ी के जाले नै । 
घण दिनां तै देख रही म्हारी दूनी बदहाली होगी 
हमनै भकाज्यां आई बरियां इवकै खुशहाली होगी 
क्यों माथे की फूट रही या दूनी कंगाली होगी 
गुरु जिसे चुनकै भेजा उसी ए गुरु घंटाली होगी 
छाती कै लागे क्यों ना दूर भगावे इस विषहर काले नै । 
घेर लिए मकड़ी के जाले नै । 
ये रंग बदलें और ढंग बदलें जब पांच साल मैं आवै से 
जात गोत की शरम दिखा के वोट मांग ले ज्यावैं सैं 
उनकै धोरै जिव जाणा हो कितका कोण बतावै से 
दारू बांटें पीस्सा वो खरच फेर हमनै ए खावैं सैं 
करें आप्पा घापी छारे पापी घाप्पै ना किसे साले नै । 
घेर लिए मकड़ी के जाले नै ।। 
क्यों हांडे से ठान बदलता सही ठिकाना मिल्या नहीं 
बाही मैं लागू और टिकाऊ ऐसा नारा हिल्या नहीं 
म्हारे तन ढ़ांप सकै जो कुड़ता ऐसा सिल्या नहीं 
खेतां मैं धन उपजावां सां फूल म्हारै खिल्या नहीं 
साथी रणबीर बणानै सही तसबीर खींच दे असली पाले नै । 
घेर लिए मकड़ी के जाले नै ।


वार्ता - सैंकटरी का सरपंच जीत जाता है। सैकटरी की हरकतें और बड जाती है। रिसाल सिंह उसकी शिकायत ऊपर महकमें को कर देता है। भूमी की इन्कवारी होती है। क्या क्या होता है। 

कहण कवि का

तर्ज : रामचन्द्र जी कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा

रागनी 20

अपणे खुद दस्तक करकै ऊपर उसने फरियाद करी। 
सैकटरी के हथकड़ी लाओ इसनै जिन्दगी बरबाद करी ॥
पांच सात और जोड़ लिए बाहण बेटी की देकै दुहाई 
मन्त्री के जा पेश हुए बोले ना होती ईव समाई 
जा उसकी सब करतूत बताई ना मन्त्री नै इमदाद करी । 
झूठी साची हुई इन्क्रवारी हुया बेरी सैकटरी छूट गया 
कर खंगारिया गालां मैं चमेली का होसला टूट गया 
भरोसा राम तै उठ गया ईमान दारी मुर्दाबाद करी । 
सैक्टरी ने करली त्यारी रिसाल सिंह उनै घेर लिया 
बदमाशां नै खेल रचाकै पिंजरे में कर शेर दिया 
ऊ' के सपन्यां का ढेर किया या दुनिया जिनै आबाद करी । 
मुनादी बाले ढोलक पीट जमा कालजा चीर गरया 
कुड़की आगी घरती की न्यू कोण्या जाने धीर धरया 
रणबीर सिह फकीर करया बोने नै अलबाद करी । 


वार्ता- रिसाल सिंह चमेली से सलाह करता है। के बनेगी? के करां बमेडी के पास भी कोई जवाब नहीं। रिसाल चिमेली को क्या बताता है :
रिसाल सिंह का कहण

तर्ज : माऊ की ढाणी जिला भिवाणी पिवं पाणी सब नलका

रागनी 21
अनबोल पशू की ढाल कमाया फेर बी ज्यान मरण मैं से। 
करजा ना लेना चाहिए पड़े रास्सा फेर भरण मैं से।
अफसर मनै न्यों बोल्या करजा देना चाहिए ले कै 
फसल बिगड़ी बेरा तनै कित टक्कर मारूं दे कै 
मुश्कल तै हम करें गुजारा गरमी सरदी नै खे कै 
लाई कसूती दाब मेरै से रस्सी को ज्यों बल दे कै 
कुणसी बिध ला पार तिरू' कोण्या जी काम करण मैं से। 
बैंक आले उल्टा मांग मेरी जमा बी आसंग ना 
धौरै थी जो धरदी सारी बची एक बी पासंग ना 
मेहनत करकै बी कंगाली या सोचरण की आसंग ना 
बालक हांड ठोकर खाते रोवण की बी आसंग ना 
छोरी फिर कंवारी घर में क्यों दीखें चीर हरण में से । 
मेरे जिसां का गाम मैं घणा मुश्किल रैहणा से रे 
कुड़की की दाब कसूती दुख कुणबे ने सैहणा से रै 
अफसरों की नीत बुरी कदे ना कदे फैहणा से रै 
टूम ठेकरी सब जाली ना धोरै ईब गहणा से रै 
भगत नै बचाइये राम जी आया तेरी सरण मैं से । 
दी भोपू' की आवाज सुणाई थोड़ी वार मैं आण कर के 
करमपूर सिघाणा मोई सुणल्यो लोगो ध्यान कर के 
बहकारी विकास बैंक ल्याया जारी फरमाण कर कै 
किश्त भपनी भर जाइयो बोल चुप्पाके आण कर कै 
रणबीर सिंह नै माफ करिये बैठ्या तेरे चरण में से। 


वार्ता – चमेली रिसाल सिंह की बात सुणक एक बं तो उदास होज्या से। पर फेर होसला कर लेती है। दो दिन पहले चम्पा से हुई बात उसके दिमाग में घमने लगती हैं। कर्ज और कूड़की का मसला उसको भी धुन की तरह खा रहा है। वह रिसाल सिंह से पूछती है –

दोहा : क्यों ना पिया बिचार कर किस तरियां खाल उतारी जा । 

कमाई खून पसीने की साहूकार लूट ले सारी जा ।। 

क्यों दस के बीस पढ़ें देने तबीयत हो घणी खारी जा । 

वख्त पड़े पै कहें अन्नदाता क्यों म्हारी अक्ल मारी जा ।।

दोहा : रिसाल सिंह क्या जवाब दे, क्या ये इतना आसान है । 
जो जवाव सही दे इसका रणवीर सिंह का मेहमान है ।। 

वार्ता – रिसाल सिंह के पास कोई जवाब नहीं है। सांटा उठाता है, बैल खोलता है और कोल्हू की तरफ चल पड़ता है। एक पहर रात बाकी है। रिसाल सिंह के घर सैंकटरी और पुलिस पहुंचती है। बिमला की आंख खुल जाती है। वह अपनी मां को उठाती है और क्या कहती है :-
बिमला और चमेली के सवाल जवाब तर्ज ।
आंखों ही आंखों में इशारा हो गया
रागनी 22
उठ बैठी हो मां मेरी दखे दिया पुलिस ने घेरा । 
दरवाजे पै थानेदार खड़या कदका रूक्के देरया 
चमेली
के करणे आए के मतलब के काम से बेटी 
जमघट लाया देहली पं के इल्जाम से बेटी 
एक आवै एक जावै के देना इनाम से बेटी
ईब और के चाहिये यो बच्या चाम से बेटी 
दिखे से कोए बाप तेरे पै सख्त मामला गेरया । 
म्हारे घर मैं आण का बेटी होसला क्यूकर पड़ग्या 
के कोए चोर लुटेरा म्हारे घर के अन्दर बड़ग्या 
मेरी समझ मैं बेटी रास्सा तेरे आला छिड़ग्या 
जब तै देखी पुलिस मनै मेरै सहम सांप सा लड़ङ्ग्या 
चाल बूझल्यो सब बातों का हमने पटज्या वेरा । 
मां बेटी थानेदार को
मां बेटी हम बझां सां हमने साची बात बता 
कुणसी चीज बेगानी करकै एक बे हाथ बता 
गैर बख्त क्यों आये चढ़गी किसकी श्यात बता 
म्हारा घर क्यों घेरया तमनै आधी रात बता 
के तपतीस करने आये सो किसके वारन्ट लेरया । 
जवाब थानेदार का
वारन्ट देख रिसाले के गिरफ्तार वो करना से 
सजा सख्त दिलानी पेश सरकार वो करना से 
सरकारी करज दिया ना भीतर एक बार वो करना से 
आंडी पाकै लेज्या पकड़ त्यौहार यो करना से 
पेश करो रणबीर सिंह नै ना लगै रोजाना फेरा । 


वार्ता - रिसाल सिंह को कोल्हू में से ही पुलिस पकड़ कर ले जाती है। चमेली बड़े हाच पैर भारती है। हल्के के एम एल ए के पास जाती है और क्या कहती है :

कहण चमेली का

तर्ज हो आज मन चेहरे से परदा हटा लिया

रागनी 23

तेरे दरवाजे पे दुखिया आई करिये मेरी सुणाई । 

बैंक नाल्यां ने भीतर कर दिया कति शरम ना खाई ।। 


दिन रात कमाए दुख पाए क्यों दूना टोटा आया यो 

ऐल फेल नहीं करया कोए खरया खोटा क्यों पाया यो 

वो सोटा मार बिठाया क्यों करी कुण्बे की रूसवाई । 


दस दिन हो लिए उनै गए नै कुछ ना लाग्या बेरा 

ना सूधे मुंह कोए बात करै मेरै दिया चिन्ता नै घेरा 

मनै दीखें से कुआं झेरा सब साची बात बताई । 


मनै सुणों से गोहाने मैं तार दिया उसका चाम कहै 

सूधी मूधी यो सोल्हू भी पूरा का पूरा गाम कहें 

संकटरी ने लिया नाम कहैं अपनी खुन्दक काढ़ी चाही । 


अन्नदाता कहें सैं तो फेर क्यों म्हारा इसा हाल हुया 

तेरै धोरै आई नेता जी यो कुण्बा कति निढ़ाल हुया 

घणा थानेदार चण्डाल हुया रणवीर की करै पिटाई । 


वार्ता - एम एल ए कहता है-वोट तै गेरो दूसरे के अर ईब काम करवावण बाबो बाई । चमेली के जी में आया बक कहदे बोट तो हम आगे बी बढ़ ए बेरांगे। पर बीते पाछे तो एम एल ए सबका ए होना चाहिए। चमेली कुछ नहीं बोली। वापिस आ जाती है। चम्पा साथ में थी। रास्ते में घर पड़ता है, चम्पा चमेली को अपने घर से जाती है। चम्पा ढाढस बंधवाने की कोशिश करती है । 

कहण चम्पा का

तर्ज : सत्यवान के घरां चाल दुख भरया करेंगी सावित्री

रागनी 24

तेरी हालत देख चमेली मनै रात नींद नहीं आवै हे मेरी बाहूण 

थानेदार का नाश जाइयो घणी सही ना जाने हे मेरी बाहण 

जेवर अपने कठ्ठ करकै बेबे में ये ल्याई सू 

देख तेरे हालात मैं बेबे बहुत घणी घबराई सू 

टूम बेच के किश्त भरां या बात समझ मैं पाई सू 

कुड़की हो घरती जावं मैं इस चिन्ता नै खाई सू 

कैंडे सर की बात रहो ना या दुनिया बही पावै हे मेरी वाहण । 


गरीबां का जीना भारया या मेरे समझ मैं आगी हे 

अमीरां के ठाठ बताये या विस्कुट कुतिया खागी हे 

राजा नल दमयन्ती ने क्यों सारी दुनिया गागी है 

रूलती हांडै आज चमेली ना कसक किसे कै लागी हे 

अमीरा की सब मेर करें ना कोए गरीब नै चाहवं हे मेरी बाहण । 


बीस हजार की टूम मेरी दस हजार मैं घर दयांगे 

गहने धरकै पोस्से ल्यावां पूरी किश्त नै भर दयांगे  

रल मिल बांटा दुख अपणा बदले के मा सिर दयांगे 

गिरते पड़ते हंसते रोते पार भव सागर कर दयांगे 

राम जी तै बूझूगी क्यों गरीबां कै फांसी लागै है मेरी बहाण । 


फौजी की चिन्ता कोन्या उसनै मैं आप मना ल्यू'गी 

सास मेरी घणी कलिहारी उसतै मैं गात छिपा ल्यू गी । 

तीज त्यौहार की देखी जा फेर तै मैं बाल बणा ल्यू गी

रिसाल सिंह उल्टा आज्या उसपै सात घड़ा ल्यूगी 

रणबीर सिह का गाम बरोना रागनो ठही बणाव हे मेरी बाहण । 


दोहा : टूम बेच पीस्से लेके किश्त भरी बैंक के म्हां । 

रिसाल सिंह पड़या छोड़ना पांच मिन्ट के म्हां ।। 


वार्ता - चमेली रिसाल सिह को चम्पा की टूमों के बारे में बताती है। रिसाल सिंह कहता है - है राम इसे माणस क्यों बचरे से ? चम्पा का यो शान में क्यूकर तारूंगा ? फेर चमेली से पूछता है-चमेली किभे करल्यां पर धरती बचनी मुश्किल दीखें से! क्या कहता है रिसाल सिह । 

कहण रिसाल सिंह का

तर्ज : भंवरे ने खिलाया फूल-

रागनी 25

कुड़की आगी जरदी छागी नाश होण मैं कसर नहीं । 

धरती जागी चिन्ता खागी डले ढ़ोण में विसर नहीं ।। 


धरती गई तो के रहज्या गुलामी करनी दीख से 

दिहाड़ी ऊपर जाणा होज्या बदनामी भरनी दीखें सै 

गाम छोड जाणा पड़ज्या गुमनामी करनी दीखै से 

घरबासे ताहि मनै या सलामी करनी दीखै से 

अफसर आगै फरियाद करी कुछ हुया कान पै असर नहीं । 


क्यों माड़ा मन कररया से धरती अपणी बचाणी सै 

नहीं अकेले सां हम आड़े मिलके अलख जगाणी से 

गाम गाम मैं कुड़की आरी सही गलजोट बणाणी से 

आप्पा मारें पार पड़ेगी सही तसवीर दिखाणी से 

हों करजवान किसान कट्ठे और कोए तो डगर नहीं। 



(30)

आंसू आरे धीर बंधावै तू' ईब तक हिम्मत हारी ना 

कहै कुड़की ना होण दयू जब तक उठे लाश हमारी ना 

क्यों पागल होरी सै तू कोए जावै पार हमारी ना 

चारों तरफ खड़े लखावां कोए दीले यो रहबारी ना 

वे म्हारे नेता कित से के उननै कोए खबर नहीं । 


कोए मखौल करें से मेरा कोए कसूता मारै तान्ना 

कोए दिखावै दया घणी और कोए कहै मत दे आन्ना 

दारू मैं पीग्या कोए कहै क्यों सोध्या नहीं रकाना 

भांत भीत की चरचा होरी कोए नहीं खालो खान्ना 

इन हालां अर इन चालां तो रणबीर होवै बसर नहीं ।

 

वार्ता - चमेली और चम्पा आपस में बात करती हैं-आगे क्या होगा ? इतनी ही देर में हरियाणा राज्य में चुनाव होने की वोषणा हो जाती है और कुड़की फिलहाल रोक दी जाती हैं। चम्पा व चमेली को थोड़ी राहत मिलती है मगर उनके दिल में भय ज्यों का त्यों है। बस उन्हें चुनाव का इन्तजार हैं, देखो उसके बाद क्या होता है । 














(31)

तर्ज : उस बैरण न ताह दिया धमका कै

रागनी

हम सबने कठ्ठे होकै यू मिलके नारा लाणा से । 

जन आन्दोलन के दम पै नया भारत हमे बणाणा से ।।

 

दिन दोगुनी रात चोगुनी या बढ़ती जा महंगाई 

किते सूखा कितै बाढ़ मची से चारों तरफ तबाही 

किसान कुमावै लुटता जा कीमत नै रोल मचाई 

सबको शिक्षा सबको काम ना होती कितै सुनाई 

मिलबन्दी तालाबन्दी तै मिलकै मजदूर बचाणा सै ।

 

यूनियन का अधिकार म्हारा खतरे में पड़ता जाने से 

महिलाओं का हक समान तनखा थोड़ी मैं टकराने से

खेत मजदूर कानून बिना दुख सबतै ज्यादा ठाने से 

भूमि सुधार की मांग के ऊपर अगर मगर क्यों लाने से 

केन्द्र और राज्यों का रिश्ता हटकै हमनै उठाणा सै

 

चुनाव सुधार हों लागू या आवाज उठाई जागी 

धर्म के ठेकेदारां की सही जड़ दिखलाई जागी 

देश का एका कोण तोड़ता या बात बताई जागी 

उग्रवाद का कोण हिम्माती या खोल सुनाई जागी 

इन बातों की खातर जनता की अदालत आणा से ।

 

मजदूर किसानों के संग छात्र नौजवान भी कदम घरैगा 

महिला पीछे ना रहैगी रैली का न्यारा ढंग फिरैंगा 

इन्कलाब का नारा प्यारा सबके अन्दर उमंग भरैगा 

शीशे के महलों मैं बैठे उन चोरों को दंग करेगा वै

ज्ञानिक सोच के दम पै सब अन्धकार मिटाणा से ।। 










शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

Jalian wala baag

भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13, अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) हुआ था। रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें 1000 से अधिक व्यक्ति मरे और 2000 से अधिक घायल हुए।
अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।
यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी।
1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। 2023 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।"


रविवार, 3 मार्च 2019

भगत सिंह

रागनी
पेज -12 से
फिरोजशाह कोटला के खण्डहरों में बैठक करते हैं। इस मीटिंग में कलकता से अनुशीलन समिति, ढाका से युगान्तर गुट, पंजाब से गदर पार्टी व नौजवान सभा, उत्तर प्रदेश व बिहार से हिन्दुस्तान रिपब्लिक्स एसोशिएसन के प्रतिनिधि जयदेव कपूर, यतीन्द्रनाथ घोष, मनमोहन बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ, कुन्दनलाल, ब्रहमदत, विजयकुमार सिन्हा, सुखदेव और भगत सिंह हिस्सा लेते हैं। सुरक्षा के लिहाज से आजाद को बुलाया नहीं जाता। इस मीटिंग में भगत सिंह भारत के बहुमत की आजादी के बारे में बताता है कि वे इस रास्ते से आयेगी जिस के लिये हम लगे हैं। सभी साथियों को समझाता है कि दुनिया की महान एवं समाज वैज्ञानिक हमारे देश के बारे में क्या सोचता है:-
दूर देश तै हवा चली वा म्हारे देश में आई
जोर जुल्म ने खत्म करण की पाग्यी ठीक दवाई -टेक
1. स्याणा माणस वो हौ से जो सोचे और बाहर की।
अपणा पेट तै दुनिया मरती किसै ने चिन्ता संसार की
ओली सौली हवा चालै पर वो कहै बात व्यवहार की।
टोटे नफे में रहै बराबर जो कहै बात विचार की।
जीवण का ढंग ठीक बतादे सही बतादे राही-1

2. इसे इसे माणस थोड़े हौ से जिनने यो ज्ञान बताया।
कै कुदरत का दस्तूर एक ना छोटा बड़ा बणाया।
करके खोज सामणे ल्यादी जिनने समझणा चाहया।
यो संसार खड़ा मेहनत  पे जीवण का राह दिखाया।
मेहनत बिना ना कुछ दुनिया में जो कर रहे होण बुगाई-2

3. सारा ज्ञान खोल के धर दिया सारे माणस एक समान
मेहनत करके आगे बढ़ग्ये जो पाग्ये फालतू ज्ञान।
ज्ञान का फायदा होणा या सबनै, आड़ै आकै बिगड़ी तान।
न्यारे सुर में गावण लाग्ये वे माणस बणे बेईमान।
बिना कमाये आधा चाहिये न्यूं दी खोद जुल्म की खाई-2

4. जिसकी होसे नीती माड़ी घणे ढाला के खेले खेल
धर्म का ठेका ले कै चालै भाई चारा कर ले गेल।
जात गोत और धर्म पै इन्सानियत नै करदे फेल
अपणा मतलब काढ़ण खातर करके जग में धक्कम पेल।
अपणा मारै छांह में गेरै जो हो सागी भाई-4

5. दूर देश में पैदा हो के म्हारे देश का कह दिया हाल।
सब ढाला की बात सोच के चोगरदे का करके  ख्याल
अंग्रेजां की लूट के कारण भारत देश बणया कंगाल।
बिन आजादी पार पड़ै ना चाहे लागज्यां कितने साल।
दुख के बादल न्यूं छंटै बणे मजदूर किसान सिपाही-5

6. अंग्रेज आड़े तै चाले जांगे फेर कांग्रेस की बणै सरकार
वे ही सारी नीति रहेंगी सारा नक्शा दिया वार।
मजदूर किसानों तै धौखा होगा दूर खड़े देखें लाचार।
असल आजादी ल्यावण खात्यर हटके होगी मारो मारे।
रघबीर सिंह सै ठावें झण्डा जब छंटै गर्द और काई-6

वार्ता: भगत सिंह वर्तमान राजनीति के बारे में बताता है कि आज कांग्रेस के नेता जिस आजादी की बात करते है उससे मजदूर और किसान का भला नहीं होगा क्योंकि यह पार्टी भारत के पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व है। यह अपने लिये कुछ सीमित हितों के लिये लड़ रही है परन्तु भूख से तड़पते हाड-मांस के वो पुतले जो गर्मी-सर्दी में बिना छत के रोजाना नया जन्म लेत हैं, उनके बारे में सोचना हमारे संगठन का काम होगा और हमें उन लोगों को समझाना होगा कि कमेरे वर्ग के एकजुट किये बिना यह राजनीतिक आजादी सिर्फ ढोंग होगी।

दिन रात कमा के भूख बैठा इस बात का करियो ख्याल
कोये मौज करै सै रंग महलां में क्यूं घणे फिरे कंगाल-टेक

पौ का पाला जेठ दोफारी खेतां म्हा पड़ा किसान।
सिर पै छात ना गात पै कपड़ा ना देही में रह रही ज्यान।
सारा कुणबा लाग्या रहै फैर भी बाजे कोन्या तान।
सारे जग नै देवे खाण नै खुद की जिन्दगी हुई बिरान।
चौबीस घण्टे रहै बेदना यो हो रहा सै बुरा हाल।

एक मजदूर कमाऊं सै जिसके तन पै नहीं लंगोटी,
घर में मूसे कला करैं सैं ना भूखां नै रोटी,
दिन और रात कमाये जा सै फर भी सुणता खोटी,
गर्मी-सर्दी बणी बराबर या बणी मुश्किल मोटी,
जै एका करण की सोचै तै या करदे पुलिस हलाल।

खान खेत और कारखाने में धन पैदा हो सै भाई,
इनते न्यारी दुनिया के म्हां और ना जगहां बताई,
मजदूर किसान कमावै धन पर लेज्या लूट कसाई,
जब तक हो एक लाश नहीं म्हारी कोन्या हो सुणाई,
कष्ट कमाई म्हारी पै दिया गैर भ्रम का जाल-3

बढ़िया कपड़े रहण नै कोठी कुछ माणस मौज उड़ावै सैं,
काजू किसमिस और मिठाई जी भर-भर के खावै सै,
खुशबू आले तेल और सावण कई तरां का लगावै सैं,
मजदूर और किसानों नैं ये मूर्ख गंवाए बतावै सैं,
रघबीर सिंह से पूत कमाऊ ईब समझ गये या चाल-4

वार्ता - इस बैठक में 2 दिन तक विचार विमर्श के बाद संगठन के साथ समाजवादी शब्द जोड़ कर हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ नाम दिया गया। प्रधान चन्द्रशेखर आजाद को बनाया जाता है। एक सेना का गठन भी किया जाता है जिसका सेनापति आजाद को ही बनाया जाता है। मजदूरों और किसानों को संगठित कर सता पर कब्जा करना जरूरी है क्योंकि लार्ड रीडिंग या लार्ड इरविन के स्थान पर तेज बहादुर या पुरूषोतम दास ठाकुर के आने से आम जनता पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिये हमारे संगठन का मकसद एक सोशलिस्ट या कम्यूनिस्ट समाज की स्थापना करना है। भारत के दौरे पर आया साइमन कमीशन जब 30 अक्तूबर 1928 को लाहौर आता है तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व के कमीशन को काले झण्डे दिखाये जाते हैं। इस प्रदर्शन में नौजवान सभा के सदस्य अगली कतारों में होते हैं और इस तरह की घटना घटती है। -
साइमन के आवरण की सुणकै पूरी कर ल्यो त्यारी,
लाहौर शहर में आके कटठे हो ग्ये क्रांतिकारी- टेक

चौगरदे के जिकरा सै करणा सै बाइकाट,
के जाणां हम साइमन नै फिरै तीन सौ साठ,
क्योंकि करणा चाहवै छांट-क्यूं अक्कल मारे म्हारी।

नौजवान सभा के साथी थे वे सब तै आगै चाले,
लाला जी सै नेता सबकै हाथां में झण्डे काले,
चारों ओड़ नै फौज रिसाले-बर्मा मिलिट्री न्यारी-2

दसमा महीना तारीख तीस वो कमीशन लाहौर में आया,
काले झण्डे देख चौगरदे साइमन भी घबराया,
लाठी चार्ज करवाया, उस जनता उपर भारी।

पुलिस मिलिट्री कही थी उड़ै तुरन्त मुकदमा त्यार करया,
लाला लाजपत राय उपर सबतै पहलम वार करया,
कह रघबीर सिंह त्यौहार करया, उड़ै पहलम वार करया।

वार्ता - इस विरोध प्रदर्शन पर पुलिस लाठीचार्ज करती है। लाला लाजपतराय पर इतनी लाठियां पड़ती हैं कि 17 नवम्बर, 1928 को उसका देहान्त हो जाता है। इस मौत से दुखी देशबन्धु चितरंजन दास की धर्मपत्नी श्रीमती बासन्ती देवी कहती है, ‘‘है कोई माई का लाल जो लाला जी की मौत का बदला ले कर दिखाये? क्या इस देश के नौजवानों का खून जम गया है?’’

कोये सै माई का लाल - जो आज यो फर्ज पुगादे-टेक

होया अनीली का पर्दाफाश-ईब ना सै न्याय की आश।
इस लाश का करके ख्याल, जो बदला ले दिखादे

के खून का होग्या पाणी-क्यूँ होगी सबकी बंद वाणी
पिछाणी जिनने गौरां की चाल, इनके मार-मार के ताहदे-2

गई लाग कालजै चोट-थम किस तरियाँ लोगे ओट
जै खोट का नहीं सै मलाल, वो के जाणेगा कायदे-3

रघबीर सिंह जै ना बिमारी काटी-हो ज्यागी रे रे माटी।
ना डटै डाटी उठती झाल, कोये या बात ठिकाणे लादे-4

वार्ता - नौजवान भारत सभा के सदस्य मीटिंग करते हैं कि इस चुनौती को हमें स्वीकार करना चाहिये पर कुछ साथी कहते हैं कि लाला लाजपत राय हमारे तो खिलाफ ही थे। ऐसे आदमी के लिये संगठन को दांव पर नहीं लगाना चाहिये। काफी बहस के बाद बदला लेने का फैसला किया जाता है। चन्द्रशेखर आजाद को लाहौर बुलाया जाता है। रात को तैयारी में मीटिंग करते हैं तो आजाद कहता है अब यह बताने का समय आ गया है कि अब विरोध ही नहीं हम बदला भी लेंगे। साथियों को समझाता है कि -

बसन्ती नै ऐलान करया के कहण पुगाणा हो
खून का बदला नहीं लिया तो जब्र उल्हाणा हो - टेक

म्हारे बिना ना और रूखाला खड़े देखें भारतवासी
सन सतावन की दस मई  नै लाग्यी थी  आग जरा सी
कलकता, रेवाड़ी, दिल्ली और जा पहुंची थी झांसी,
अंग्रेजाँ के जुल्म के कारण लाल सड़क बणी हांसी
ईब मिर्जा मुनीर और हुक्मचंद का मोल चुकाणा हो-1

देश के फपर कुर्बानी देंगे वे वीर क्रांतिकारी
मंगल पांडे, तुलाराम वा लक्ष्मीबाई नारी।
उदमीराम का गात साल दिया आवाज ईब तक आ रही
मंगल खां और कदै खां ज्यूं करके दिखाणा हो-2

वासुदेव बलवन्त फड़के होये चाकेकर भाई
मदनलाल धींगड़ा नै भी हंस के नै फांसी खाई
खुदीराम करतार सिंह, सत्युन्द्र और कन्हाई,
रामप्रसाद संग अशफाक उल्ला ये सच्चे हमराही
राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह ज्यूं फांसी खाणा हो-3

बहादुरशाह वीर होया जिनै देष पै लाल खपाये
रंगून जेल में रह्या तड़फता न उल्टे कदम हटाये,
फारूखनगर और नवाब लौहारू फांसी पै लटकाये,
रोहनात, मंगाली, भाटल पुटठी ये गाम घणै सताये
आग लगा के गाम फूंक दिया म्हाये लाणा-बाणा हो-4

सोने की चिड़िया कहा करें थे गौरां नै दिन फेर दिये
अन्न -धन के भण्डार लूट के बणा कति टुक टेर दिये,
आजादी के मांगण आले मार-मार के गेर दिये,
ईब सबका बदला लेणा सै जो लाजपत ज्यूंकर ढेर दिये
रघबीर सिंह यो जब्र भरोटा पड़ै, हमनै ठाणा हो-4

वार्ता - योजना के अनुसार हत्या का बदला लेने के लिये चन्द्रशेखर आजाद भगत सिंह, राजगुरू, जयगोपाल और महावीर सिंह दिनांक 17 दिसम्बर 1928 को सांय 4.30 बजे पुलिस कार्यालय के पास मोची लेते हैं। पुलिस अधिकारी मोटरसाइकिल पर गेट की तरफ बढ़ता है। महावीर सिंह के ईशारा मिलते ही राजगरू गर्दन में गोली मारता है। साथ ही भगत सिंह भी 4-5 गोली मारता है। सभी साथी भाग जाते हैं। अर्दली सरदार चन्नण सिंह उनका पीछा करता है। चन्द्रशेखर उसे गोली मारकर ढेर कर देता है।
18 दिसम्बर 1928 को लाहौर में दीवारों पर लाल पर्चे चिपकाये मिलते हैं जिन पर लिखा होता है, ‘‘जी.पी.साण्डर्स’’ जैसे एक साधारण पुलिस अफसर के अपवित्र हाथों करोड़ों जनता के आदरणीय नेता का खून सारे देश का अपमान था तथा इस कलंक को धोना भारतीय युवकों का परम कर्तव्य था।
हिन्दुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी। आज दुनिया जान गई है कि भारतीय जनता अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हर कीमत चुकाने के लिए तैयार है। साण्डर्स को खत्म करते समय हमें जिस एक आदमी को खत्म करना पड़ा, उस के लिये दुख है, लेकिन वह उस अमानुषिक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का एक पुर्जा था जिसे नेस्तानबूद (खत्म) करना ही पड़ा। हमारा लक्ष्य ऐसी क्रांति के लिये काम करना है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य की लूट, दमन, अन्याय का खात्मा कर देगी।
-बलराज (आजाद संगठन के नाम)
प्रधान
हिन्दुस्तान शोसिलस्ट रिपल्किन एसोसिएशन
साण्डर्स हत्या के बाद भगत सिंह अपने माता-पिता को पुत्र लिखता है कि आपकी दी गई शिक्षा के पहले इम्तिहान में हम पास हो गये हैं:-

भगत सिंह में लिखण खात्यर कागज कलम उठाई।
इन्कलाब जिन्दाबाद लिख कर दी शुरू लिखाई-टेक।।

पहलम लिख्या माता-पिता के चरण शीश मुवाणा,
सब कुणबे की लिखी नमस्ते जो घर में याणा स्याणा,
फैर लिख दी मत चिन्ता करियों मत दिल में घबराणा,
जाण सी राह चाल पड़ै ना उल्टा कदम हटाणा,
बड़े-बड़या कै शीष नुवाणा चाचे, ताऊ और भाई।

थारी शिक्षा अनुसार सीख लिया नहीं किसे तै डरणा,
तनै सौ जन्मा के समान बताया एक बै देश पै मरणा,
सेवा करके इस भारत की जगत जहान सै तिरणा,
गादड़ भभकी तै डरै नहीं म्हारा शेरां का सै खरणा,
बिना आजादी चैन मिलै ना या कसम देश की खाई-2

तनै बताई पाग्यी राही चाल्या तेरा सपूत री,
आर्शीवाद तेरा मेरे सिर पै हाथ बणे मजबूत री,
सरकार फिरंगी तोड़ेगें जो बड़ग्यी बण कै भूत री,
गौरे पापी काढ़े बिन म्हारे ना आंव कति सूत री,
खून का बदला खून हौवे तेरी आग्यी काम पढ़ाई-3

लाला जी का बदला ले लिया कति करी ना वार
सत्रह दिसम्बर सन अठाइस नैकरया मुकदमा त्यार,
लाहौर शहर के बीच में होया होली कोड त्यौहार,
रघबीर सिंह न्यूं चिटठी लिख दी खुशी गात में बेशुमार
जग में ऊंचा सिर तेरा न्यूं होग्यी सफल कमाई-4


वार्ता - साण्डर्स को मारने के अगले ही दिन शहर से बाहर निकलते हैं। जबकि सारे शहर की नाकेबंदी कर दी जाती है। क्रांतिकारी किस तरह बाहर निकलते हैं:-

पकड़न खातिर पहरा ला दिया नाकेबंदी करवाके,
लाहौर शहर सै चाल पड़े थे वे नकली भेष बणाके - टेक

दुर्गा भाभी नै साथ ले के चाल्या भगत सिंह,
बीर मर्द का भेष बणाया बेटा लिया सचिन्द्र संग,
ना चेहरे पै चिन्ता थी गात के म्हां भरा उमंग,
टेशण उपर आगे सारै देख शहर का ढंग,
मेम साहब बणी, दुर्गा भाभी न्यारा ढंग बणाकै।

मेम साहब का गौरा मुख जाणु ले रहा चांद उजाला,
बत करै थी हंस-हंस के नै ना बोलण का टाला,
चौकस हो कै चाल पड़े कदे होज्या खाण्ड का राला,
टेशण तै जब गाड़ी चाली होये बचण की ढाला,
खड़े सिपाही दरवाजे पै वे बात करें धमकाके-2

भगत सिंह भी भेष बदल कै बणया अंग्रेज अधिकारी,
पेंट कोट और टाई चश्मा चेहरे पै रौनक न्यारी,
राजगुरू नै नौकर बण कै करी चालण की त्यारी,
कति अन्देशा मन में न था खुशी गात में छा रही,
चन्द्रशेखर गया लिकड़ शहर तै आख्यां में धूल बगाकै-3

जाल तोड़ के लिकड़ गये वे होग्ये थे आजाद,
अंग्रेजां की पहरेदारी सब कर दी थी बरबाद,
खून का बदला खून लिया यो देश करेगा याद,
सरे देश में दिया सुणाई इन्कलाब जिन्दाबाद,
रघबीर सिंह कह खुशी मनाई कलकते में जाके-4

वार्ता - 21 दिसम्बर को सभी क्रांतिकारी अलग-अलग ढंग से लाहौर से निकल जाते हैं। भगत सिंह दुर्गा भाभी के साथ और राजगुरू उनके नौकर के रूप में कलकता सुशीला दीदी के पास पहुंच जाते हैं। उन्हीं दिनों बम्बई के कपड़ा मजदूर हड़ताल करते हैं तो क्रांतिकारी मजदूरों के समर्थन में संदेश भेजते हैं:-

कटठे हो ल्यो मजदूरों ना ईब देगी काम मुलायमी,
मौत भली उसी जिन्दगी तै जड़ै भरणी पड़े गुलामी - टेक

सारे देश में रूक्का पड़ग्या चौगेरदे नै माच्या शोर,
राज का तख्त हालता दिखे रोला होग्या चारों ओर,
माल मुफ्त का खावण आले सबकी साहमी बणग्ये चोर,
वो मिल का मालिक भी रोवै सै मजदूराँ का देख्या त्यौर,
ईब हो के गैल किसानां नै दी गेर राज में खामी-1

तालाबंदी काम राज का फेर उल्टै धमकावै,
आज कमेरा भूखा बैठा कुछ पापी मौज उड़ावै,
वे बंगला में ऐश करें हम दिन और रात कमावै,
इनने चाहिये पान मिठाई आड़ै बासी भी ना थ्यावै,
म्हारी कष्ट कमाई नै ये लेगे लूट हरामी-2

पुलिस और गुण्डे मजदूरां नै नौच-नौच के खाते,
रिश्वत खोरी, गुण्डागर्दी ये कति नहीं शरमाते,
लाला जी नै सैल्यूट मारते कमेरयां नै धमकाते,
हो अफरातफरी लूट मार हम सरकार ईसी ना चाहते,
लड़ों लड़ाई खून बहादयां नहीं थमेगी थामी-3

ट्रेड यूनियन मजदूरों की करणा चाहवै भंग दखे,
हक मांगे ते जेल मिलै घणे बणा दिये तंग दखे,
ठालो झण्डा लाल हाथ में हक मांगण का ढंग दखे,
बम्बई शहर तै शुरू करो सारे हिन्द में जंग दखे,
रघबीर सिंह कह लड़ना होगा बिल्कुल आहम्मा-साहमी-4

वार्ता- सरकार हड़ताल, धरना जलूसों पर पाबन्दी के लिये राष्ट्रीय असैम्बली में दो बिल औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम और आवश्यक सेवा, कानून ‘औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम और आवश्यक सेवा कानून’ पास कर के मजदूरों की हड़ताल को खत्म करना चाहती है। क्रांतिकारी सलाह मशिवरा करते हैं कि जब बिलों पर बहस हो बम धमाका कर विरोध किया जाये फिर गिरफ्तार हो कोर्ट को एक मंच के तौर पर प्रयोग किया जाये ताकि अखबारों के जरिये हमारा कार्यक्रम आम जनता तक जाये। इसके लिये विजय कुमार सिन्हा तथा बटुकेश्वर दत को तैयार किया जाता है। जब सुखदेव को पता चलता है तो वह भगत सिंह को धमकाता है कि तुझे पता है इस काम को तेरे बिना कोई नहीं कर सकता तो तूने अपना नाम क्यों नहीं दिया? भगत सिंह कहता है भाई मैं तेरी बात के लिये अब भी तैयार हूँ-

ठाडु बोल क्यूं धमकावै तूं बात खोल के धरदे,
कौणसी गलती हुई मेरे तै दिये हटा भ्रम के परदे-टेक

वा बात कौण सी फहग्यी - मेरी कसूर कड़ै सी रहग्यी,
कौण सी बुर्ज किले की ढहग्यी खोल बात नै पेट भरदे-1

तेरे सुण-सुण के नै बोल - भाई गया कालजा डोल,
सब बातां की हो ज्या सोल, कद दे जौ आ रही सै हिरदे-2

तनै करी मेरे तै आश-खड़ा बणा हुक्म का दाम,
तेरा खोऊँ ना विश्वास, तेरी जगहां बदले में सिर दे -3

मनै पाटया कोन्या बेरा - खोट बतादे के सै तेरा,
रघबीर सिंह हो उज्जड़ डेरा, ना तै गाम गोचरी कर दे-4

वार्ता - सुखदेव की बातों से दुखी हो भगत सिंह आजाद से कह कर फिर से संगठन की मीटिंग बुला कर असैम्बली हाल की कार्यवाही में बटुकेश्वर दत के साथ अपना नाम रखवा लेता है। अप्रैल 8, 1929 जब एसैम्बली में कार्यवाही के लिये जाना होता है तो भगत सिंह ने अपने नये जूते और घड़ी जो गदर पार्टी के यौद्धाओं द्वारा फरवरी 1915 में गदर का समय निर्धारण करने के लिये खरीदी थी, किन्तु उस प्रयास के असफल रहने के बाद रास बिहारी बोस ने यह घड़ी सचिन्द्र नाथ सान्याल को दी। सान्याल ने यह घड़ी भगत सिंह को सौंप दी, भगत सिंह ने उसे जयदेव को भेंट कर दी।
8 अप्रैल 1929 को योजना के अनुसार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत असैम्बली की दर्शक दीर्घा में पहुंच जाते हैं। ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट व आवश्यक सेवा कानून,  इन दोनों कानूनों को भारतीय प्रतिनिधि बहुमत से निरस्त कर चुके परन्तु सर जार्ज शूस्टर विशेष अधिकार से पास करने की घोषणा करने के लिये उठता है तो भगत सिंह गृहसचिव की बैंच के पीछे बम फैंकता है, बटुकेश्वर पर्चे फैंकता है। दोनों नारे लगाते हैं, इंकलाब जिन्दाबाद, समाजवाद जिन्दाबाद। इन पर्चों में लिखा होता है कि - बहरों को सुनाने के लिये बहुत ऊंची आवाज की जरूरत होती है। राष्ट्रीय दमन और अपमान की उतेजना पूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस संसद के पाखण्ड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रांति के लिये तैयार करें। हम मनुष्य जीवन को पवित्र मानते हैं और ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिससे प्रत्येक व्यक्ति को स्वतत्रता का अवसर मिले। हम इन्सान का खून बताने की अपनी विवशता पर दुखी है परन्तु क्रांति द्वारा सबको सम्मान स्वतंत्रता और मनुष्य के शोषण को समाप्त करने के लिये क्रांति में कुछ में कुछ न कुछ अनिवार्य है।
ईन्कलाब-जिदांबाद
बलराज (चन्द्रशेखर आजाद)
कामाण्डर-इन-चीफ
पुलिस के सिपाही दोनों को गिरफ्तार करने आते हैं भगत सिंह उन्हें धमकाता है और कहता हैः-
थारे कैसे पापियां नै खो दिया हिन्दूस्तान।
जुल्मी मतना दिखावै श्यान - टेक
1. जन्म भूमि आजाद हो तो सुख कैसा डेरा हो सै।
गुलामी की हवा भी माड़ी ना कोये रहण बसेरा हो सै।
हुक्म सुण्या और चाल पड़ा तनै नहीं बात का बेरा हो सै।
भारत देश गुलाम बणा यो अंग्रेजां के सिर पै ताज।
तेरे जैसे नौकर मिलग्ये करण खात्यर देश पै राज।
इनकी खात्यर त्यार मरण नै हटज्या परे नै धोखेबाज।
भारतीवासी देशद्रोही यो अंग्रेज बण्या बलवान - 1
2. दो आना की करै नौकरी लोगां नै तंग करण लाग्या।
नहीं शरम का खोज तेरे हो बेशर्म फिरण लाग्या।
अंग्रेज तनै शाबास देंगे घमण्ड में सहम भरण लाग्या।
बिन आई में मरया जागा थोड़े से दिन रहग्ये शेष।
वो दिन नेड़े आरहा सै अंग्रेज छोड़ के भाजैं देश।
फेर सोचले मौका सै दखे पाछै कोन्या चालै पेश।
भाईयां उपर जुल्म करै तू कति बणकै शैतान-2
3. म्हारे देश के कारीगर सब जेलां के म्हां दिये डार।
हीरालाल जुलाहा और खान मिस्त्री दिये मार।
दीन ईमान बच्चा कोन्या ईज्जत होई तार-तार।
म्हारे देश की ईज्जत लूट रही क्यूं बैठा सै करले होश।
जीणा मुश्किल होग्या भाई सबकी दई आत्मा मोश।
देश भलाई करले भाई छोड़ दे ये सारे दोष।
स्वार्थ ने दे छोड़ ईब तू दिये छोड़ अभिमान-3
4. कितने देगे कुर्बानी हंस-हंस कै ज्यान खपाई।
हर हालत में आजादी हो कसम मरण की खाई।
तूं भी छोड़ नौकरी गौरां की करले देश भलाई।
मजदूर किसान मोर्चे पै तूं कर रहा गद्दारी रै।
एक दिन वो भी आवैगा तेरी खाल तार ले सारी रै।
मेहनतकश की म्हारे देश में फौज बणी सै न्यारी रै।
रघबीर सिंह इतिहास पढ़ै बिन मिलै नहीं किते ज्ञान-4
वार्ताः- भारतीय सिपाही पीछे हट जाते हैं। सार्जेन्ट हेरी दोनों को गिरफ्तार करता है। इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद बहुत से साथी गिरफ्तार कर लिय जाते हैं। परिस्थितियों से चन्द्रशोखर आजाद थोड़ा सा निराश होता है, सुशीला दीदी पूछती है भाई आज कुछ उदास हो? आजाद कहता है कि दीदी मैं कितने ही नौजवानों को लड़ाई के लिए तैयार करके कितनी मांओं के बेटों को, बहनों के भाई, सुहागिनों के सुहाग छीनता हूं और एक-एक कर फांसी के फंदे पर भेजता हूं या गोली के सामने कर देता हूं और दोबारा से नये साथी तैयार करने निकल पड़ता हूं। और जब मैं एकेला होता हूं तो यह सारी सोच कर दुखी हो जाता हूं। सुशीला दीदी पूछती है और चन्द्रशोखर आजाद बताता है किः-
सुशीला - मैं पूछूं संू भाई मेरे तनै कौण सी चिन्ता खा सै।
आजाद - के पूछेगी बाहण सुशीला छाती के म्हां घा सै-टेक
1. सुशीला - या तै तूं भी जाणै सै मैं बाहण नहीं मां जाई रे।
पर धर्म बाहण हो सगी बराबर तूं मेंरा बड़ा भाई रे।
कौण सी बात कर दर्द हुआ तनै ना खोल बताई रे।
ल्हको करै क्यूं खोल बतादे जो तेरे मन में आई रे।
कौणसी बात का दर्द होया तनै क्यू ंना खोल सुणाई रे।
आज मेरे तै बात छुपावै यो बात कौण सा न्याय सै -1
2. आजाद - भाई बंध और मात पिता सब छोड़या कुटुम्ब कबीला।
देश की खात्यर दा पै लाया ना किसे बात का गिला।
या तै तूं भी जाणै सै ऐ गौरां का जबर वसीला।
बिन कुर्बानी आजादी ना सुणले बहाण सुशीला।
फांसी हो ना तै काला पाणी जो दरिया बीच जगहां सै - 2
3. सुशीला - तनै बताया हमनै सीखा लिया बसन्ती बाणा।
किसे बात में कसर ना छोड़ैं ना तेरे सिर उल्हाणा।
अन्न धन के भण्डार भरै पर दुभर पीणा खाणा।
मालिक थे वे नौकर होग्ये कर रहा राज बिराणा।
तेरे बताये मालूम पाटी के आजादी का भा सै - 3
4. आजाद - ज्यान हथेली पै धरकै नै जो संगठन में आयेे
मनैं पाठ पढ़ाके क्रांति आला लड़ण नै त्यार बणाये।
विधान सभा में बम गेरण नै दोनूं मनैं खंदाये।
कै फांसी कै काला पाणी मौत के मुंह पहंुचाये।
कह रघबीर सिंह न्यूं सोचूं के छुटावण की जो राह सै- 4
वार्ता:- सुशीला दीदी आजाद के कहे अनुसार भगत सिंह और बटेकेश्वर दत्त से मिलने जेल जाती हैं और आजाद का संदेश कि बाहर की चिन्ता ना करना अपना काम पूरा ध्यान से करना और कहती हैं कि:-
सुशीला का भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त से कहना
तर्ज: सावन
तुम सुणियो रे मेरे बीर, बात कहूं सुणों ध्यान तै-टेक
1. भाई ने भेजी फेटण आई थारी खात्यर यो बेरा ल्याई।
भाई रे दुखां में सांझा सीर, लड़ेंगे आन बान और श्यान तै - 1
2. सरे कै सै चर्चा थारी, लोगों कै सै चिन्या न्यारी।
रेे थारी अदालत बणी जागीर, करदो तोड़ खुलाशा ब्यान तै - 2
3. भाई पहरेदार का पहरा सै यो दर्द कसूता गहरा सै।
फहरा राज सै बे पीर म्हारा पाला पड़ रहा बेईमान तै-3
4. जुल्मी का करके पर्दाफाश थम नया लिख दयो इतिहास।
ना कदे उदास होवै रघबीर ईन्कलाब सुणेगा हर जुबान तै-4
वार्ताः- सुशीला दीदी की बात सुन भगत सिंह कहता है दीदी संगठन ने हमें जो जिम्मेदारी दी है हम उसे हर हाल में पूरी करेंगे और यह विश्वास भी दिलाते हैं कि हम कामयाब होंगे और कहता है कि हमारी तरफ की चिन्ता ना करना -
भगत सिंह का सुशीला को कहना
चिन्ता मतना करै बाहण हम आलैं तावल करके।
गौरे पापी अंग्रेजों के जुल्म खड़्डे में भरके - टेक
1. या खत्म हो राजशाही मिल के खड़े हों जब लोग लुगाई।
ईब आर पार की छिड़ी लड़ाई चाले ज्यान हथेली पै धरकै-1
2. न शान्ती देगी काम रहो लागे सुबह और श्याम।
म्ंजिल पै जाके करै आराम ना बीच में बैठे घिरकै-2
3. ईब ईंकलाब हो जिंदाबाद इस राज की आली मियाद।
हर हालत में देश आजाद ना कदम हटे ईब मौत तै डरकै-3
4. थम एक बात दिनल में धरियो जो रहज्या उसने पूरा करियो।
रघबीर सिंह कै दुख नै हरियो जब धजा लाल शिखर में करकै-4
वार्ता:- दिनांक 3 मई 1929 को सरदार किशन सिंह वकील असफ अली के साथ भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त से मिलने आते हैं ताकि इस केस के बारे में सलाह मश्विरा किया जा सके। परन्तु ये दोनों कहते हैं कि इस स कोर्ट में यह नहीं कहेंगे कि हमने बम नहीं फैंके। बार-बार समझाने के बाद भी अपने ब्ययान नहीं बदलते। दिनांक 6 जून 1929 को सैशन जज लियो नाईमिडिल्टन की अदालत में भगत सिंह और बटुकेश्वर ब्यान लिखकर वकील को देते हैं, बम फैंकने से हमारा मकसद किसी को मारना नहीं था बल्कि भारतीय जनता की आवाज अंग्रेजी हकूमत के बहरे कानों तक पहंुचाना था। मजदूर या उत्पादक संसार का सबसे महत्वपूर्ण अंग होते हुए भी लूटेरे उनकी खून पसीने की कमाई को हड़प जाते हैं। दूसरों के लिए अनाज पैदा करने वाला किसान स्वयं अपने परिवार के लिये अनाज प्रप्त करने वाला किसान स्वयं अपने परिवार के लिये अनाज प्राप्त करने के लिए तड़पता है। कपड़ा बुनने वाला संसार की मण्डियों के लिये कपड़ा तैयार करता है, लेकिन वह अपना तथा अपने बच्चों का शरीर तक नहीं ढक सकता। मिस्त्री लोहार जो शानदार महलों का निर्माण करते हैं खुद गन्दी झोपडियों में रहते हैं। सिर्फ अपने मनोरंजन के लिये बहा देते हैं। जज भगत सिंह को बहकाने की कोशिश करता है कि तेरे से पहले और भी क्रांतिकारी आये जो सब खत्म हो गये, तूं अपना घर बसा तो भगत सिंह जवाब देता है:-
जज-भगत सिंह के सवाल जवाब
तर्ज - यूं ही दिल ने चाहा था रोना
जज - भगत सिंह ले मान काहे की तेरी बालक उम्र नादान
भगत सिंह - के समझावै रास्ता टोहले ईब जाग्या हिन्दूस्तान - टेक
1. राजनीति में आकै नै क्यूं सोचे ज्यान खपाणी।
देश की खात्यर मरज्या तै के मरणे में हाणी।
मूर्खता में मरग्यी था वा झांसी आली राणी।
मेरी रगां में खून शेर का मतना समझै पाणी।
कोन्या आणी जाणी रै तू बात मेरी ले मान।
ईब उल्टा कदम हटै कोन्या चाहे ईब लिकड़ज्या ज्यान -
2. बिन आई में क्यूं मरता तनै हट हट कै समझाउं।
या नहीं पढ़ाई मेरे काम गुण आजादी के गाउं।
तेरे देश की जनता मजे करै सै चाल तनै दिखाउं।
थारी चाल नै जाणूं सूं मैं नहीं बहका में आउं।
तेरे मात पिता भी बाट देख रहे सुखी अगत बेल संतान।
जन्म भूमि पै अर्पण सै मेरा ईब होवै इम्तिहान - 2
3. काले पाणी तारा जा ओड़ै देखे मुहं नै ठाकै।
भारत की आजादी खत्यर राजी फांसी तक भी खाकै।
भगत सिंह तेरी मर्जी सै मैं छक लिया सूं समझाकै।
नहीं जरूरत तेरी शिक्षा की दिये लन्दन में जाके।
तनै पाछे दुख पाणा होगा खो ज्यांगे अरमान।
जो करण सै वो करले तूं मतना धरै अहसान- 3
4. बड़े-बड़े गये ज्यान तै मारे कै मिलगी आजादी।
हम भी न्यूऐ मर ज्यागें ना देखी जा बर्बादी।
इन बातां में के धर्या सहम करवाले ब्याह शादी।
यो सारा देश मेरा कुणबा सै सूरत देश पै लादी।
तनै उम्र कदै की सजा मिलै जब आच्छा आवै ज्ञान।
कह रघबीर सिंह चाहे फांसी लागे हो ना बंद जुबान - 4
वार्ताः- 12 जून 1929 को दोनों को आजन्म काले पानी की सजा दी जाती है। भगत सिंह को मियांवाली तथा बहुकेश्वर दत्त को लाहौर सैन्ट्रल जेल में रखा जाता है। गंदा खाना व अलग-अलग रखने के विरोध में 15 जून 1929 से दोनों भूख हड़ताल शुरू कर देते हैं। इन्हीं दिनों संगठन के 28 साथी गिरफ्तार कर लिये जाते है। जून की 25 तारीख को भगत सिंह भी लाहौर सैन्ट्रल जेल में लाया जाता है जहां उेस जतिन दास, अजय घोष, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोरी लाल, देशराज, फणीन्द्र नाथ घोष मिलते हैं। कांग्रेज, मुश्लिम लीग और हिन्दू महा सभा के लोग अपने अपने हिसाब से जनता में भ्रम डाल रहे हैं। जिससे अंग्रेज साफ बच जाता है। अब असल आजादी के लिये लड़ना सिर्फ हमारे ही जिम्मे बचा है और देश संगठन व पार्टियों की तात्कालीन राजनीति के बारे में बतात है।
लाल किले पै धजा फरकती लाल निशान चाहिये सै।
मजदूरां के संग में राज तख्त पै किसान चाहिये सै - टेक
1. सन् अठारह सौ सत्तावन में एक जंग छिड़ी थी भारा।
बहरमुपर में मंगल पाण्डे जिसने दिया था ललकारा।
दसभई नै अम्बाला में एक लाग्या था हुकांरा।
फेर मेरठ के म्हां वीरों ने दिया आजादी का नारा।
एक बणा था भारत सारा उसा धमासान चाहिए सै - 1
2. कुछ दिन पाछै ब्यौंत बिगड़ग्या पासा पड़ग्या औला।
हटके फेर गुलाम बणे होगा और ढाल का रौला।
अंग्रेजों ने सलाह बणाके खड़ा करया एक टौला।
फेर महात्मा गांधी आकै बोल्या मैं करदयूं सब सौला।
एक लंगोटी धार के चौला ना ईया भगवान चाहिये सै - 2
3. कांग्रेस नै दिया था नारा हम कष्ट करौगे दूर।
अहिंसा का नारा देके दिया जाल कसूता पूर।
खेती बाड़ी करने आले चाहे हो मजदूर।
सहज-सहज समझण लागे ना गौरां का कसूर।
म्हारी छाती के म्हां बण्या नासूर इसका निदान चाहिये सै - 3
4. हिन्दू सभा और मुश्लििम लीग बोलै एक बाणी।
कांग्रेस भी इनकी गौल्यां या सै अजब कहाणी।
साहूकार जमींदार एक बणे चाहे राजा हो या राणी।
मजदूर किसान ना कट्ठे होज्यां ईब जाली बात पिछाणी।

वार्ताः- कुछ दिन भगत सिंह और बटुकएश्वर दत्त को छोड़ बाकी सब को लाहौर बरेस्टल जेल भेज दिया जाता है। कुछ ही दिनों बाद विजय कुमार सिन्हा और राजगुरू भी पकड़ लिये जाते हैं। जुलाई 13 सन 1929 को सभी साथी भूख हड़ताल में शामिल हो जाते हैं। तीन सप्ताह की भूख हड़ताल के बाद जतिन दास, अजय घोष, शिव वर्मा, देशराज की हालत खराब हो जाती है। भगत सिंह, ‘‘दुश्मन की अदालत से न्याय की आशा करना बेवकूफी होगी’’ कह कर कोर्ट का बहिष्कार कर देता है। 17 जुलाई 1929 को दोनों का एक-एक हाथ पुलिस वाले के हाथ से बांध कर जबरदस्ती कोर्ट में पेश किया जाता है। जज के आतंकवादी कहने पर वे कोर्ट की किसी भी प्रकार की कार्यवाही में हिस्सा लेने से इन्कार कर देते हैं। जज पूछता है आखिर तुम चाहते क्या हो? तो भगत सिंह  कहता है हम देश से पूंजीवाद का सफाया करके सत्ता मेहनत करने वालों के हाथों में देना चाहते हैं और बताता है किः-
(भगत सिंह का कोर्ट में ब्यान)
हम चाहवैं हो देश म्हारा आजाद।
गुलामी ना उटै ईब चाहिए हम कर राखे बबार्द - टेक
1. लूट खसोट मिटणी चाहिये ना कोये पिसता नर हो।
माणस सारे एक जिसे ना किते जोर जबर हो।
रोटी कपड़ा मिले बराबर सबका अपणा घर हो।
धन धरती पै हक हो सबका लूटी जा ना कदे कमाई।
करे काम का मिलणा चाहिये धेला हो चाहे हो पाई
भाईचारा होणा चाहिये मिल कै रहै सब भाई-भाई।
न्यूं मेरा देश होवै आबाद-1
2. चाहना आली चीज मिले ब्यौंत जिसा मिले रोजगार।
कद्र काया की होनी चहिये कमाणिया नर हो चाहे नार।
काम चोर हो चौड़े में चोर अपणा आपा लेवे सुधार।
बूढ़े ठेरे ना फिरैं तरसते सरकार सभी का राखै ध्यान।
लंगड़े लूले दुखी रहैं ना हाज्या सबका आदर मान।
दवा दारू हो मुफ्त पढ़ाई मुफ्त रहण नै मिलै मकान।
देश में चाहिये सै समाजवाद- 2
3. शिक्षा का प्रबंध इसा ना कोये अणपढ़ रहै पावैगा।
हारी और बिमारी मिटज्यां जब जी में जी आवैगा।
तानाशाही रिश्वत खोरी जड़ा मूल तै जावैगा।
ना डाका ना चोरी होगी ना हो पाप घोर किते।
नहीं किते हो गुण्डागर्दी ना माचैगा शोर किते।
एक हो कानून सब पै ना हो धक्का जोर किते।
ज्ब होगा ईन्कलाब जिन्दाबाद - 3
4. क्रांति का तनै भेद बतादूं सारे चाहिये एक समान।
असली मतलब ईब खोल दूं सुणलों खूब लगा के ध्यान।
डोर राज की थामेंगे मिल कै नै मजदूर किसान।
क्रांति हो फेर शान्ती होज्या खत्म लड़ाई हों सारी।
गुलामी कटज्या आजादी बटज्यां कटै बिमारी बस म्हारी।
देश का विकास होगा कइै रघबीर सिंह प्रचारी।
यो राह सै एक मार्क्सवाद- 4
वार्ताः- भूख हड़ताल से कई क्रांतिकारियों की हालत काफी खराब हो जती है। देश के कोने-कोने से विरोध भरी आवाजें आती हैं। 2 सितम्बर 1929 को सरकार झुक जाती है परन्तु जब तक जतिनदास की हालत काफी बिगड़ चुकी होती है। यह भूख हड़ताल का 51वां दिन होता है। दुर्गा भाभी जेल में मिलने आती हैं। वह भूख हड़ताल से बिगड़ी हालत पर चिन्ता करती हैं तो भगत सिंह कहता है किः-
भगत सिंह का दुर्गा भाभी को समझना
(तर्जः रामचन्द्र कह गये सिया से .....)
साच बतादे दुर्गा भाभी क्यूं चेहरे पै जर्दी छााई।
सुबक-सुबक कै क्यूं रोवै मेरे नहीं समझ में आई- टेक
1. मनै बतादे भाभी री होग्यी कौण सी आज खराबी।
के नई विपत्ता आण पड़ी जिसकी ना मिलती काये चाबी।
खोल बता दे दुर्गा भाभी करके नै गात समाई - 1
2. जो मन में सै साी कहले खड़ा ईब तेरे पास।
म्हारी ओड़ तै भाभी री तूं मतना होवै उदास।
म्हारे कुर्बानी की लाग्यी चास, या छिड़गी ईब लड़ाई - 2
3. बड़ी भाभी छोटे देवर बेटे कैसा हो सै।
या तो मैं भी जाणूं सूं तेरा मेरे में घणा मोह सै।
क्यूं कर रही आज ल्हको सै तूं किस डर तै घबराई - 3
4. देश के उपर अर्पण सै क्यूं आखां में आसूं ल्यावै।
क्रांति का दस्तूर योहे दुनिया कहती आवै
रघबीर सिंह इसे छंद बणावै, बाचेंगे लोग लुगाई -4
वार्ताः- 24 फरवारी 1930 को सभी विचाराधीन कैदी अपनी गर्दनों पर लाल रूमाल बांध कर अदालत में आते हैं। मजिस्ट्रेट के सामने समाजवादी क्रांति जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं और भगत सिंह एक तार तीसरी ईन्टरनैशनल, मास्को के अध्यक्ष के नाम भेजने के लिये मजिस्ट्रेट को देता है। जिसमें लिखा होता है, ‘‘लेनिन दिवस के अवसर पर सोवियत संघ में हो रहे महान अनुभव और साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिय अपनी दिली मुबारकबाद भेजते हैं। हम अपने को विश्व क्रांतिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं। मजदूर राज की जीत हो, सरमायादारी का नाश हो।’’ ईन्कलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, विचाराधीन कैदी, 24 फरवारी 1930, लाहौर षड्यन्त्र केस।
भूख हड़ताल के 63वें दिन जतिनदास का देहान्त हो जाता है। शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जाता है। यह गाड़ी जिस भी स्टेशन पर रूकती है हजारों की संख्यां में लोग इकट्ठा हो नारे लगाते हैं। क्रांतिकारियों को छुड़ाने के लिए बम बनाए जाते हैं। 28 मई 1930 को रावी नदी के जंगलों में बमों को टैस्ट करते समय एक बम भगवतीचरण वोहरा के हाथ में फट जाता है। जिससे उसका पेट फर कर आंते बहार निकल पड़ती हैं दोनों हाथ उड़ जाते हैं और वे मौक पर ही दम तोड़ देते हैं। इस घटना से भगत सिंह बहुत दुखी होता है पर हिम्मत करके दुर्गा भाभी के नाम पत्र लिखता है, ‘‘भाभी हिम्मत रखना, हम जिस पथ के राही हैं, ये उस पथ की मंजिलें हैं।’’ और कहता है:-
भगत सिंह की चिट्ठी दुर्गा भाभी को
देश पै कुर्बानी दें वैं असल देश के वीर।
मतना दिन नै माड़ा करिये भाभी धरले धीर - टेक
1. भगवती भाई देश पै मरग्या गलामी की खाई भरग्या।
वो तोड़ण की राही करग्या, गुलामी की जंजीर - 1
2. जग सै आजादी का झोया, इसमें अपना साथी खोया।
क्हे हो कै रास्ता टोह्या, औड़े याहे थी तस्वीर - 2
3. एक मेरी याहे सै फरियाद ईब हम होज्यांगे आजाद।
ईन्कलाबा कहै जिंदाबाद तेरा सचिन्द्र बीर - 3
4. यो तै जुल्म खड़ा भरण सै हमनै जग में न्यारा काम करणा सै।
या मौत जरूरी मरणा सै, तूं समझ लिये रघबीर - 4
वार्ताः- 30 सितम्बर 1930 को सरदार किशन सिंह सरकार को अर्जी देते हैं कि जिस दिन साण्डर्स मारा गया भगत सिंह लाहौर में नहीं था। अखबारों के माध्यम से जब भगत सिंह कोइ इस बात का पता चलाता है तो पिता के नाम पत्र लिखता है कि,‘‘पिताजी तेरा पुत्र भगत सिंह अब भी वही भगत सिंह है जो जेल में जाने से पहले था। पिताजी जब अखबार में अपकी अर्जी पढ़ी तो मुझे काफी दुख हुआ है कि एक देशभक्त सिर्फ अपने बेटे को बचाने के लिये ऐसा कर सकता है।’’ काफी सोचविचार के बाद 4 अक्तूबर 1930 को पत्र लिखता है कि -
पिता जी को पत्र
(तर्ज - चांद खिला और तारे हंसे)
मेरे गत मंे दुख बणग्या पढ़ कै नै अखबार।
गल्ती की तो माफी चाहूं पर हो लिया लाचार - टेक
1. तेरे ब्यान नै पढ़ कै नै मेरा धक-धक हिरदा हाला।
मैं न्यूं सोचूं एक देशभक्त यो कौण सी राही चाज्ला।
ठीक मान कै मनैं बताई जिस राही पै मैं घाल्या।
ईब इसे पै मरणा सै पिताजी कति कंरू ना टाला।
जन्ममोम का रूद्धन सुणा या हमने रही पुकार - 1
2. देशभक्त तूं आज बता क्यूं हो रहा नर्म सुभा सै।
तूं आच्छी ढांला जाणौ सै के आजादी का भा सै।
देश के उपर मरण तै आच्छी और कौण सी राह सै।
तूं चाहवै अंग्रेज काढणा याहे म्हारी निंगाह सै।
यो जम्म मोम का रूद्धन सुणी वा हमनै रही पुकार- 1
3. दिन धोली में साण्डर्स मार्या कोन्या ल्हको पिताजी।
खून का बदला खून लेवां न्यूं लाग्यी लौ पिताजी।
इन गौरां का नाश हमने करणा खो पिजाती।
नौजवानसभा बणी सै जंगी ना शान्ती हो पिताजी।
शान्ती और अहिंसा ये ना म्हारे औजार - 3
4. अंग्रेज देश तै काढे़ जां जब हो सरकार हमारी।
मेहनतकश की मेहनत मिलै खत्म हो जंमीदारी।
जीवण का अधिकार मिलै खुश होगी प्रजा सारी।
समाजवाद की राह टोहवैं सारे काम बणै सरकारी।
रघबीर सिंह से मालिक होंगे जो असली हकदार - 4
वार्ता:- 7 अक्तूबर, 1930 को लाहौर षड्यन्त्र केस के तहत गिरफ्तार किये गए नौजवानों को स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया जाता है। तो भगत सिंह कहता है,‘‘ जज साहब, आजादी हम लोगों का बुनियादी अधिकार है, हर आदमी को अपनी मेहनत का फल प्राप्त करने का अधिकार है, हर देश अपने साधनों का मालिक है। हम चाहते हैं कि मौजूदा समाज व्यवस्था को एक बढ़िया समाज व्यवस्था में बदल दिया जाए।’’ जेल के भीतर ही लगाई गई स्पेशल कोर्ट भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी, किशोरी लाल, शिव वर्मा, गया प्रसाद, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, महावीर सिंह और कमलनाथ को आजन्म काले पानी की सजा देती है। अजय घोष, यतीन्द्र नाथ सान्याल व देश राज को बरी कर दिया जाता है। चन्द्रशोखर आजाद, कैलाशपति और सतगुरू दयाल अब तक फरार ही होते हैं। फैसले की खबर सुनकर भगत सिंह की मां मिलने के लिए जेल जाती है। गेट पर खड़ा सिपाही गेट से मना कर देता है।
तो विद्यावती और सिपाही में बातचीत होती है कि:-
हट-हट के नै अर्ज करूं उस भगत सिंह के नाम की।
मिल कदे नै बाट देख रही सवेरे तै श्याम की - टेक
1. मां - फेटण खात्यर आई सूं किते मिला कोये राह कोन्या।
मात पूत नै नहीं मिलण दे यो कुदरत कै न्याय कोन्या।
माणस पण का ख्याल करले के तेरे दिल में डाह कोन्या।
क्यूं घौंस दिखाणा चाहवै सै के तेरे घर मां कोन्या।
इतना जालिम क्यूं हो राह सै के जागीर मिले किसे गाम की -1
2. सिपाही - न्याय नीति का बेरा ना मैं करण गुजारा आराह सूं।
जिसा हुक्म मिले वो पड़े पुगाणा बस अपण फर्ज पुगा रहा सूं।
हां जी हां जी कहणा हो सै इसे बात का खा रहा सूं।
और जीवण का राह कोन्या ना देखूं बाट ईनाम की - 2
3. मां - मैं अपणे दुखां तै दुखी फिरूं घणी दुखां की मारी।
अंग्रेजां का राज आड़ै एक याहे मश्किल भारी।
सारा कुणबा रहै जावता जेल में बारी-बारी।
मेरे लाल पड़े ओड़े जेल में आज मिलण नै आरही।
तू के कह मैं जाणू सूं जो के हालत होया करै गुलाम की - 3
4. सिपाही - हुक्म का बणया गुलाम खड़ा सूं गेट पै पहरेदार मैं।
जो भी तो आदेश मिलेगा कर ना सकूं इन्कार मैं।
खामे खां में दोष धरै ना बड़ी सूं सरकार मैं।
त्रिशंकू की ढाल लटक रहा आलिया मंझदार में।
रघबीर सिंह मैं उनमें कोन्या जिनने नहीं जरूरत राम की - 4
वार्ता:- आखिर विद्यावती को भगत सिंह से मिलने की ईजाजत मिल जाती है। भगत सिंह खुश हो कर मां से मिलता है तो मां कहती है बेटा तेरा इम्तिहान का समय है, हिम्मत रखना और कहती है कि:-
विद्यावती का समझाणा
भगत सिंह मेरा बेटा तू आज मेरा ख्याल करिये रे।
किसे ढाल का डर मतना मेरे लाल करिये रे - टेक
1. फेटण खात्यर आई सूं तेरा हुक्म होया सै फांसी का।
कदे गहज्या ऐकला बहज्या यो चांद मेरा पणवासी का।
याहे राही मुक्ति आली न्यू ंनाश हो सत्यानाशी का।
तेरे नौजवान सभा के साथी कहैं उसे ढाल करिये रे - 1
2. जोर जुल्म बढ़ता जावै और आगे की थाह कोन्या।
दीन ईमान छोड्या कोन्या माणस पण का भा कोन्या।
आहमी साहमी लोगे मार्चा इसतै न्यारा राह कोन्या।
ईब सौ जन्मों के जैसे तेईस साल करिये रे - 2
3. तेरे रोम-रोम में रहा होया इब हो चाल्या कुर्बान रे।
मन में घणा उम्हाया था तेरा ओड़ै ऐ या ध्यान रे।
तेरा ईन्कलाब घणा दूर गया यो जाग्या हिन्दूस्तान रे।
तूं करतार सिंह की राही चाल्या उसऐ हाल करिये रे - 3
4. रघबीर सिंह कह राजी होग्यी मेरे गात में भरा उमंग।
ऐसा काम करिये बेटा सुण के दुनिया रहज्या दंग।
मैं सारे देश में बेरा करद्यंू शहीद हो मेरा भगत सिंह।
मेरे दूध का मान बधे इसी मिशाल करये रे - 4
वार्ताः- उन्हीं दिनों बब्र अकाली आन्दोलन के बाबा रणधीर सिंह भी लाहौर सैन्ट्रल जेल में होते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी का हुक्म हुआ है तो भगत सिंह के पास जा कर कहता है,‘‘बेटा आखिरी समय में वाहे गुरू, खुदा, भगवान को याद करना चाहिए।’’ तो बाबा रणधीर सिंह और भगत सिंह के बीच बातचीत होती हैः-
यो संसार दुखां का सागर ना कोये किसे मीत।
टेम आखिरी वाहे गुरू तै जोड़ लिये प्रीत- टेक
1. मरणा जीणा लागया जीव के पड़ै लाजिमी जाणा।
हाथ बात सब ईश्वर के ना चालै धिगंताणा।
जितने गिण के सांस दिये जो लिख्या भाग में खाणा।
जो दे सै वो उल्टा ले तो या खोड़ सै माल बिराणा।
उस परम पिता नै रटले बेटा बीत गई सै बीत-1
2. कुदरत का दस्तूर बताया सारे माणस एक समान।
कोये छोटा कोये बड़ा बणा क्यूं सुण ले बात लगा के कान।
कोये भूखा कोये नगर सेठ से बिना कमाये कर रहा दान।
जोर जुल्म और लूट मार पै राम कदे भी दे ना ध्यान।
गरीबां का तो रूद्धन सुणे ना बेईमानां का सुणे संगीत-2
3. मेरी कही तूं समझा कोन्या कोन्या लाया जोड़ तनै।
गली गली में चर्चा सै तेरी याद करैं करोड़ तनै।
घमण्ड का पर्दा खड़ा बीच में परम पिता दिया छोड़ तनै।
तूं न्यूं सोचै मैं बड़ा हो लिया रास्ता लिया मोड़ तनै।
सब के कारज सारण आला उस बिन कोन्या जीत-3
4. झूठी मठी बतां का मनैं भेद पाट लिया सारा सै।
पत्थार की एक बणा मूर्ति पाखण्ड बणाया भारा सै।
कितणे गरीब मरैं भूख तै यो सत्तर भोग लगा रहा सै।
के मजदूर किसान कोये भी नहीं राम नै प्यारा सै।
रघबीर सिंह से समझेंगे फिर लिख करेंगे गीत-4
वार्ताः- बाबा रणधीर सिंह फिर कहता है भगत सिंह एक बार भगवान को याद करले। भगत सिंह कहता है, ‘‘बाबा, मजदूर और किसान की दिन-रात की मेहतन पर डाका डाला जा रहा हो, लूटने वाला दिन रात ऐश कर रहा हो भगवान कुछ भी ना करे। मुझे किसी भी देवता या भगवान की कोई जरूरत नहीं है।’’ बाबा रणधीर सिंह गुस्से में कहता है भगत सिंह आज सारे देश में तेरी चर्चा है। इस प्रतिद्धि के कारण तेरा सिर चकरा गया है जिससे तेरे अन्दर अहंकार पैदा हो गया है। जो तेरे और भगवान के बीच शाह पर्दे की तरह खड़ा है। इतना कह रणधीर सिंह निराश हो बैठ जाता है तो भगत सिंह कहता है कि:-
इन बातां में के धरया सहम क्यूं बैठा सिर पकड़ के।
ये रूढ़िवादी विचार आंख में कुणक की ढांलां रड़कै - टेक
1. मनैं बचादे मरणे तै इसा राम किते धनश्याम नहीं।
मैं डर जाउं मरणे तै इसा हृदय मेरा मुलायम नहीं।
मनैं दिखै सै एक आजादी और करण नै काम नहीं।
मैं राजी सूं फांसी खाकै पर चाहता तेरा राम नहीं।
ताकत थी तै क्यूं बाली मर्या बड़े के भीतर बड़के -1
2. श्रूद ढोर ढ़ोल और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी।
इसे-इसे राजे बणे देश के फेर भी लोग कहैं न्यायकारी।
ईज्जत लूटें गैर बीर की जति कहै दूनिया सारी।
ना चाहिये अवतार मनैं ये कृष्ण कै से बलकारी।
तेरे देश पै राज विदेशी यो सोग्या राम कित पड़के-2
3. बिस्मिल की गैल्यां तीन मारे जब राम कड़ै जा रहा था।
जलियांवाला काण्ड कर्या जब के डायर मार्या था।
महाभारत क्यूं हाया देश में खुद कृष्ण आ रहा था।
चोर उच्चके बणे देवता यो पागल देश ......
करया देश का नाम कति ये कथा नई-नई धड़कै -3
4. हक की खातर लड़ने का कदे दिया राम नै ज्ञान नहीं।
कौण कमावै कौण खा रहा कदे राम कैरे पहचान नहीं।
मुफ्तखोर नै ये ढांे़ग बणाये इन बिन बाजे तान नहीं।
गरीब आदमी नै आज तलक भी मिल्या कदे भगवान नहीं।
रघबीर सिंह जब मांगे रोटी के राम लिकड़ज्या जड़कै -4
वार्ताः भगत सिंह 2 फरवरी, 1931 को अपने साथियों के नाम पत्र लिखता है कि साथियों इस समय हमारा आन्दोलन बहुत ही महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक साल के तगड़े संग्राम के बाद कांग्रेसी नेताओं को बुलावा दिया गया है कि वे संविधान की तैयारी में हाथ बंटाये। यह बात हमारे लिये महत्वपूर्ण नहीं है कि कांग्रेसी नेता इस हालत में आन्दोलन को बंद करने के हक में फैसला करते हैं या इसके विपरीत? यह तो निश्चित है कि वर्तमान आन्दोलन का अन्त किसी ना किसी समझौते के रूप में ही होगा। यह दूसरी बात है कि समझौता जल्दील हो या देस से। ‘‘सरकार के इस बुलावे के बाद गांधी अपने सभी आन्दोलन ठप्प कर देते हैं और क्रान्तिकारियों से भी अपील करते हैं कि सभी तरह की कार्यवाही रोक दी जानी चाहिए। सुखदेव गांधी जी को पत्र लिख कर अपील करता है आप एक बार हिन्दूस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ के साथियों से मिल लें अगर यह गलत लड़ाई लड़ रहे हों, तो हम रोक देेगंे। अगर आप उनसे मिलना भी ना चाहते हों तो मेहरबानी करके हमें शिक्षा देने की जरूरत ना समझें, लिखता है कि:
सुखदेव का गांधी जी को पत्र
गुस्ताखी की तै माफी चाहूं पर कहे बिन दिल डटै नहीं।
कुर्बानी और हत्या बिना या कदे गुलामी कटे नहीं - टेक
1. था जनता में जोश बहोत फेर क्यूं करी अपील तनै।
अहिंसावादी आन्दोलन म्हारा याहे दई दलील तनै
समझौता करग्या गौरां तै सही गड्य दिया मील तनै।
जिंदगी भर तक दर्द रहेगा इसी ठोक दी कील तनै।
फेर क्यूं मैं तेरी राही तै दुख के बादल छंटै नहीं।
2. गौरां गैल्या समझौता कर दिया जी नै रासा।
आर-पार की जंग छिड़ी थी पलट दिया तनै पाशा।
कांग्रेसी सब छुटा लिये या झूठी तेरी दिलासा।
आन्दोलन दिया तोड़ बख्त पै दे लोगों नै झांसा।
मेरी ख्याल तेरे रोग और सैयेतरो मर्ज मिटै नहीं -2
3. बब्बर अकाली गदरी बाबे जेलां के म्हां सड़ रहे सैं।
देवगढ़ कानपुर और लाहौर काण्ड आले अड़ रहे सैं।
कितनी बेटी बाहण म्हारी जीने रासे छिड़ रहे सैं।
इनकी तो तनै पूछी कोन्या धरां बैठ के घड़ रहे सैं।
जै हमदर्दी राखैं सै तै तेरा मिलणे में किमे घटै नहीं - 3
4. जै माणस पण का ख्याल करै ईतणा कहण भतेरा।
चन्द्रशेखर तै फेट लिये फेर भरज्या पेटा तेरा।
ना मानै तूं अपणे राजी ईन वीरों नै सै खुद बेरा।
लोग दिखावा रहम कर्र मत ले थाम अपण डेरा।
रघबीर सिंह कहै क्रान्तिकारी कदे उल्टे हटैं नहीं - 4
वार्ता:- जेलर के पूछने पर कि तुम्हें तो फांसी होगी वो क्रांति कहां गई, भगत सिंह कहता है, ‘‘क्रांति संसार का नियम है, और यह संघष्र का परिणाम है। भारत में यह संघर्ष तब तक चलता रहेगा, जब तक मुट्ठी भर लोग अपने फायदे के लिए आम जनता की मेहनत को लूटते रहेंगे। ये लूटेरे भारतीय हों, चाहे अंग्रेज हों या दोनों मिल कर खड़े हों। संघर्ष को, क्रांति को दुनिया की कोई भी ताकत रोक नहीं सकती। मुझ जैसे हजारों, लाखों मरेंगे और करोड़ों पैदा होंगे, चाहे मैं जमीन पर रहू या न रहूं क्रांति हमेशा अमर रहेगी।’’
चन्द्रशेखर आजाद संगठन की बैठक बुलाकर सभी सदस्यों से कहता है कि साथियों की गिरफ्तारी सजा ये सब हमारे आन्दोलन का हिस्सा है। इनसे घबराना नहीं है यह स्थिति स्थायी नहीं है समझाता है कि:-
आजादी मांगी ना मिलती जीत्यां करैं बलवान।
अमर शहीदी के पावैगा जी कै हथेली उपर ज्यान - टेक
1. दसमा महीन तिथि सात नै खिला चांद होई पणवासी।
लिख्या फैसला मार्च मं ये तोड़े जां तीनों फांसी।
राजगुरू सुखदेव भगत सिंह नै याद करैं भारतवासी।
ये मर कै भी जिंदा रहेगें तुम मतना करो उदासी।
त्ीन मरैं सौ पैदा होंगे देश के पूत महान-1
2. इस माटी तै जन्म लिया सै हम भारत के लाल।
इसे खात्यर अर्पण सै सब ना कति मरण की टाल।
दिये वचन तै ना कति हटांगे मरैं वीरों की ढ़ाल।
गोली फांसी चाहें सूली होज्या पर ना बदलेगाी चाल।
देश का बोझ धरया कांधे पै तुम वीर देश की श्यान - 2
3. भारत की आजादी का यो बीड़ा ठाया नौजवानों नैं।
क्रांति का संदेश चोगरदे यो पहुंचाया नौजवानों नै।
ईन्कलाब का नारा प्यारा सै अपणाया नौजवानों नै।
ये अलख जगावण चाल पड़े यो सोया हिन्दूस्तान - 3
4. अहिंसा आला नारा ला कै अजादी की दई दुहाई।
अंग्रेजां तै समझौता करके एक न्यारी चाले राही।
चौराहे पै लोग खड़े ना रास्ता कोये दिया दिखाई।
म्हारे जिम्मे यो काम बचा सै कांग्रेस गई छोड़ लड़ाई।
रघबीर सिंह ईब जंग छिड़ेगी संग में त्यों मजदूर किसान-4
वार्ताः- बैठक में फैसला किया जाता है कि यशपाल रूस जाकर वहां के मजदूर किसानों के क्रांतिकारी संगठनों के काम करने के तौर-तरीकों का अध्ययन करे और किसी भी प्रकार की जो भी मिले सहायता ले आये ताकि दोबारा से हम फिर पुरजोर तरीके से आन्दोलन खड़ा कर सकें, परन्तु यह योजना सिरे नहीं चढ़ती क्योंकि 27 फरवारी 1931 को सुबह ईलाहबाद के एल्फ्रेड पार्क में पुलिस से मुठभेड़ में चन्द्रशेखर शहीद हो जाता है। फरवरी की अठाईस तारीख को गंगाघाट पर चन्द्रशेखर आजाद का दाह संस्कार किया जात है।
38. घटना का वर्णन
सारे शहर में करलाहट मचग्या जब अर्थी ठाके चालै।
पक्षी तक भी रोवण लाग्ये जब कर दिया अग्त हवालै - टेक।
1. शहर बीच औड़े बागां के म्हां भीड़ होई बड़ी भारी।
हो रही बंद जुबान सब कै घणी उदासी छारी।
धार खून की पड़ी देख होगा नैनां तै जल जारी।
जड़ै पड़ा था खून वीर का पूजैं थे नर नारी।
हिया उझल के आवै था बता किसनै कौण संगवाले - 1
2. गंगाघाट पै ले के आग्ये शूरवीर की लाश।
चेेहरे का था नूर गजब खिल्या होया प्रकाश।
यो मुहं तै जणु ईब बोलगा ना था कति उदास।
जे देखे वो रोवण लागज्या अंग्रेजों थारा जागा नाश।
जुल्मी जोर जब देख के सबके कालजे हाले - 2
3. ल्याके लाकड़ी चिता बणादी साथ खड़े संगी साथी।
एक ऐकला आया था आज दूनिया बणी हिमायती।
एक मामूली माणस था जो बणया जग का पंचायती।
क्हे जोर जुल्म और लूट मार या कोन्या मैंने सुहाती।
पराधीन सुपनेहू सुख ना के पीवै के खाले - 3
4. पवन भी मंद गति में चालै देख वीर की श्यान।
पत्ते तलक भी ना हालैं औड़े पेड़ खड़े सुनसान।
अग्नि जारी होई चिता में जब रोया था आसमान।
हुक मार के रोवण लाग्ये बालक बूढ़े और जवान।
रघबीर सिंह ईसा ढ़ंग देख के के रोवे के गाले -4
वार्ताः- 3 मार्च 1931 को भगत सिंह के परिवार के सभी लोग मिलने के लिए आते हैं तो भगत सिंह अपनी मां को एक तरफ ले जाकर कहता है, ‘‘बेबे जी फांसी के दिन आप ना आना, आप रोयेंगी। लोग आपको सम्हालने में लगेंगे कि लाश लेंगे। ऐसा ना हो आप पागलों की तरह रोती फिरैगी तो लोग क्या कहेंगे कि भगत सिंह की मां रो रही है।’’
सारे देश से नौजवानों, मजदूरों, किसानों की आवाजें उठती हैं कि गांधी जी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए दबाव डालें पर 19 मार्च 1931 को शिमला में महात्मा गांधी और लार्ड इरविन के बीच बैठक होती है मगर इरविन की आत्मकथा के अनुसार गांधी जी द्वारा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी को आजन्म कारावास में बदलने का मसला आखिरी समय में उठाया गया जब बैठक का एजेण्डा खत्म हो चुका था। लाहौर जेल में बंद जयदेव कपूर एक दिन भगत सिंह से कहता है, तुम मरने जा रहे हो तुम्हें अफसोस तो नहीं है? भगत सिंह कहता है तुम जैसे मेरे साथी हो जो बिल्कुल एकेले विपरीत हालातों में भी ना घबराते हों तो मुझे मरने के लिए हौसला मिलता है और कहता है कि:-
साम्राज्यवाद कै खड़े सामणे कर छाती बज़र की।
ज्यान हथेली पै लेके आरहे फेर बात कौण सी डरण की - टेक
1. अपणा पेट तो दूनिया भरती जैमाणस पण का ध्यान हो।
दुखिया का दुख करले साझा वो सच्चा ईन्सान हो।
पुरूषार्थ हो जीवण की राह ना मन में अभिमान हो।
जोर जुल्म कै साहमी डरज्या यो माणस का ईमान हो।
अपणा फैसला खुद करते हम ना चाहना सै जर की -1
2. जनता के अधिकारां खातर लड़ते लोग लुगाई।
दिन और रात लागे रहैं जो आन्दोलन की राही।
जीत बिना ना बणै हौसला जा बैठ बीच में भाई।
इसी-इसी भी बणया करै जब रहज्या एक सिपाही।
वाहे राही चालें जा जो बहादूर शाह जफर की -2
3. एक ऐकला चाल्या जावै हो घनघोर अंधेरा।
सुुनी राही ना कोये साथी ना किते बीच में डेरा।
हमदर्दी के बोल सुणै ना ना कोये तेरा मेरा।
सारे बोझ नै धर कान्धे पै एक जोत बाल के ल रहा।
उल्टा हटणा मौत मान ली न्यू बाजी लादी सिर की -3
4. कोन्या देखै बाट आर का जा आग चाला जा रहा।
अपणे सिर पै जब्र भरोटा एकला ऐ ठा रहां
ईन्कलाब का बणा सिपाही ध्यान ठिकाणे ला रहां
इसे-इसे मेरे साथी सै इनने जाणेगा जग सारा।
कह रघबीर सिंह हो पूरी मन की ना हम ना बाट देखते हार की - 4
वार्ताः- भगत सिंह कहता है कि तुम जैसे मेरे साथी हों फिर घबराने की तो बात ही नहीं हो सकती, क्रांति के इस मार्ग मर कदम रखते समय मैंने सोचा था कि यदि मैं अपना जीवन देकर देश के कोने-कोने तक ईन्कलाब जिंदाबाद का नारा पहुंचा सका तो मैं समझूंगा मुझे अपने जीवन का मूल्य मिल गया। आज फांसी की इस केाठरी में लोहे के सीखचों के पीछे बैठकर भी मैं करोड़ों देश वासियों के कष्टों से उठती हुई हुंकार को सुन सकता हूं। मुझे विश्वास है कि मेरा यह नारा स्वाधीनता संग्राम की चालक शाक्ति के रूप में साम्राज्यवादियों पर अंत तक प्रहार करता रहेगा। मेरा मित्र, ईतनी छोटी जिन्दगी का इससे अधिक मूल्य हो भी क्या सकता है?
सरकार फांसी से दूसरे क्रांतिकारियों को कहीं ओर ले जाना चाहती है। जेलर के कहने से सभी लाईन में बारी-बारी तीनों साथियों से मिलते हैं शिव वर्मा, भगत सिंह के सामने जाते ही आखों में आंसू आ जाते हैं तो भगत सिंह कहता हैः-
मरणा जीणा लाग्या सब कै या छोटी सी बात।
आखां में क्यूं पाणी आया बता भाई प्रभात- टेक
1. मैं नाम डरण का भूल गया जब होगा क्रांतिकारी।
देश पै अर्पण करग्यी आके जेल में महतारी।
देणी सै कुर्बानी भारी ना कति बचाईये गात - 1
2. मरणे का डर मनैं कति ना ध्याान देश पै लागा।
ईन्कलाब का नारा प्यारा घर-घर में पहुंचाया।
हो रहा मेरे मन का चाहा, जो करीं थी मैंने खुभात - 2
3. कटै गुलामी उस राही पै करया मनैं कुर्बान।
ईन्कलाब दे मनैं सुणाई इब जाग्या हिन्दूस्तान।
एका करैं मजदूर किसान में टूटेंगी हवालात - 3
4. इसतै बडी मोल बता के दो दिन की जिन्दगानी का।
रघबीर सिंह से जिकर करेंगे म्हारी देश कहाणी का।
इतिहास लिखैं कुर्बानी का तो कागज कलम दवात -4
वार्ता:-भगत सिंह कहता है , ‘‘भावुक बनने का समय नहीं है, प्रभात (शिव वर्मा का संगठन में नाम) मैं तो कुछ ही दिनों मंे सारे झंझटों से छुटकारा पा जाउंगा, लेकिन तुम लोगों को लम्बा सफर तय करना पड़ेगा। मुझे विश्वास है उत्तरदायित्व के भारी बोझ के बावजूद इस लम्बे अभियान में तुम थकोगे नहीं, पस्त नहीं होंगे, हार मान कर रास्ते में बैठ नहीं जाआगे।’’ और कहता है किः-
लिया धार बसन्ती बाणा फेर चेहरे क्यूं जर्दी छाई।
तूं भगत सिंह का साथी सै फेर क्यूं रोया मेरे भाई - टेक
1. हर माणस का मरणा जीणा सब का न्यारा न्यारा।
अप-अपणी सब जिंदगी जीवेम कोये निमल कोये भारा।
क्रांतिकारी माणस हो सै जणु ध्रुव सा तारा।
एक ऐकला रहज्या फिर भी दे ईन्कलाब का नारा।
इसे वीर लड़ाके इस दुनिया में भरैं जुल्म की खाई - 1
2. अपणापण के बोल सुनण नै जब माणस तरसावै।
एक ऐकला रहज्या फेर भी ना मन में धबरावै।
कदे न कदे तो मिलेगी मंजिल आगे से बढ़ता जावै।
सुन्नी राही घणा अंधेरा ना उल्टा कदम हटावैं।
कर बज्र सा गात ईब तेरी होज्या एकल कमाई-2
3. ईब लड़ाई अंग्रेजां तै आजादी खात्यर लड़ रहें सैं।
जोर जुल्म और शोषण हो ना न्यूं गौरां तै भिड़ रहें सैं।
इन गौरां के जाये पाछे हम एक नक्शा घड़ रहे सैं।
पर तूं जावे ये काले गौरे मिल कै आगै अड़ रहे सैं।
लेन देन की बात चाल रही कोन्या शर्म सच्चाई - 3
4. तेरी आंखा में नीर देख के मेरा कालजा हालै सै।
तनै नीम का पत्थर होणा होगा यो देश थारे हवालै सैं।
ढ़ील करी रखवाले ने तो ना चोर कति घर घालै सैं।
गौरे काले मिल के रवाज्यां जै तूं ना देश सम्हालै सैं।
रघबीर सिंह तूं धीर राखिये ना देगी काम ढ़िलाई - 4
वार्ताः- दिनांक 20 मार्च, 1931 को क्रांतिकारियों के वकील प्राणनाथ मेहता अपील के बारे में बात करने जेल जाते हैं तो भगत सिंह कहता है, ‘‘हमने यह तो पहले ही भेज दी है कि, हमारे प्रति युद्ध बंदियों जैसा व्यवहार किया जाये हमें फांसी की बजाय गोली से उड़ाया जाये।
22 मार्च, 1931 को भगत सिंह अपने साथियों के नाम संदेश भेजता है कि, कुछ लोगे फांसी की सजा के बारे में अलग विचार रखते हैं परन्तु साथियों यदि मैं पूरे देश में ईन्कलाब जिन्दाबाद का नारा अपना जीवन देकर भी प्रसारित कर सका तो समझूंगा कि मैंने अपने जीवन का मूल्य पा लिया है। अगर मैं फांसी से बच जाउं तो शायद क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धम पड़ जाये या सम्भवतः मिट जाये लेकिन दिलेराना ढ़ंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में भारतीय मांये अपने बच्चों में भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी। 23 मार्च को सुबह भगत सिंह का पूरा परिवार मिलने के लिए आता है। परन्तु मिलने की ईजाजत नहीं मिलती तो भगत सिंह अपने छोटे भाई कुलबीर सिंह को पत्र लिखता है, ‘‘आखिर दुनिया में दूसरे  लोग भी तो हजारों मुसिबतों में फंसे हैं और फिर लगातार एक साथ मुलाकातें कर तबियत सेर नहीं हुई तो दीगर मजीद मुलाकातों से भी तसल्ली ना हो सकेगी।’’
लेगों को पता चल जाता है कि भगत सिंह के परिवार के लोगों को मिलने भी नहीं दिया गया तो जेल के गेट पर भीड़ ईकट्ठी हो जाती है। भारी पुलिस व मिलिट्री के आने के बाद भी लोग गेट से नहीं हटते जहां विद्यावती बैठी है वहां भीड़ बढ़ती जाती है तो किशन सिंह कहता है उठो नही ंतो क्या पता कितने भगत सिंह देने पड़ेगंे और कहता है किः-
किशन सिंह का विद्यावती को कहणा
तर्ज: सामण की
इन तीनों की गैल में, आड़ै घणे मरेगें।
ना तै उठ खड़ी हो घरां चाल - टेक
1. दिल में धर निलये धीर मत नैनां का खोवै नीर।
इस हो रही धक्का पेल में, ना ये लोग डरेगें।
कुछ आगे का कर ख्याल - 1
2. ईन गौरां का जब्र वसीला-आड़ै घणे मरैं हों उट मटीला।
देखिये खूनी जेल में, आड़ै ताल भरेंगे।
दिये इस मौके ने टाल - 2
3. तूं घूंट सब्र की भरले, उठ खड़ी हो तावल करले।
पो तै होणा सै इस खेल में, ये तारके शीश धरेेंगे।
ये देश के हो लिये लाला-3
4. तूं मतना देर लगावै बिगड़ी बात हाथ ना आवै।
कह रघबीर सिंह रेलमपेल में, ये कायर करेंगे,
बेरा ना कितने होंगे घायल - 4
वार्ता:- सरदार किशन सिंह कहता है, ‘‘उठो जल्दी करो एक-एक पल कीमती है, पागल मत बनो, समझो कि जब तक तुम यहां से सनहीं हटोगी तब तक यहां से कोई नहीं हिलेगा, भीड़ को यहां से हट जाना चाहिए नही ंतो गोली चल जाऐंगी और एक भगत सिंह के साथ ना जाने कितने भगत सिंह देने पड़ेंगे।’’
23 मार्च, 1931 को जेलर कोठरी के गेट पर आकर भगत सिंह से आखरी ईच्छा पूछता है भगत सिंह कहता है, ‘‘एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बातें कर रहा है यह पूरी होने दें।’’ (उस समय भगत सिंह के हाथ में लेनिन की जीवनी होती है।) वह दो मिनट बाद उठ खड़ा होता है कहता है चलो चलते हैं।
त्ीनों को फांसी के तख्ते पर लाया जाता है, तीनों आपस में एक दूसरे की तरफ देखते हैं सुखदेव कहता है, ‘‘हम रहें ना रहें हमारी जनता जीवित रहेगी, मार्क्सवाद का हमारा उद्देश्य अवश्य जीवित रहेगा।’’ भगत सिंह मौके पर खड़े मजिस्ट्रेट को कहता है मजिस्ट्रेट साहब आप वास्तव में बहुत भाग्यशाली हैं क्योंकि आपको यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा है कि भारतीय क्रांतिकारी अपने महान आदर्श के लिये किस प्रकार हंसते-हंसते मौत का आंलिगन करते हैं। फांसी के तख्ते से तीनों साथी आने नौजवान साथियों को संदेश देते हैं किः-
तीनों वीरों का नौजवानों के नाम संदेश
(तर्ज: तेरे द्वार खड़ा एक जोगी ....)
सभी साथियों को लाल सलाम।
हम छोड़ चले इस देश को तुम लियो साथियों थाम - टेक
1. अपणा काम करते जाओ, जन्म ले ले मरते जाओ
जब तक मिलै ना आजादी।
सारे देश में लाओ क्रांति, कोन्या देगी काम शान्ती।
यूं होज्या घणी बर्बादी।
बीच में डोबैं अहिंसावादी, इसके दो गेर लगाम - 1
2. देश छोड़ कै हम तो चाले, ईब थारै सै देश हवाले।
करियों साथियों ख्याल।
इसकी खात्यर लड़ो लड़ाई, कट्ठे करके लोग लुगाई।
करद्यो धरती लाल।
अर्पण करदो ज्यान माल, तुम मत करियो अराम - 2
3. ल्याणा सै आड़ै समाजवाद, भाईचारा हो आबाद।
हो सब कट्ठे नौजवान।
क्रांति का करो प्रचार, चौबीस घण्टे रहा त्यार।
ल्यो संग मजदूर किसान।
देेश हवाले करदो जयान, के जीवेम माणस गुलाम - 3
4. म्जदूर किसन हो कठे भाई, कार्ल मार्क्स की चालैं राही।
कमेर्यां के नेता खाश।
झण्डे में हथोड़ा दाती, रघबीर सिंह सै म्हारा साथी।
वो छापेगा इतिहास।
मेहनतकश नै कर्या पास उसका बण्डाहेड़ी माम - 4
वार्ताः- तीनों क्रांतिकारी लगाते हैं
ईन्कलाब-जिन्दाबाद, जिन्दाबाद-जिन्दाबाद
समाजवाद-जिन्दाबाद, जिन्दाबाद -जिंदाबाद
पूंजीवाद-मुर्दाबाद, मुर्दाबाद-मुर्दाबाद
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद- मुर्दाबाद, मुर्दाबाद
आखिर 7 जब कर 23 मिनट पर फांसी का तख्ता गिरा दिया गया। पूरी जेल ईन्कलाब-जिंदाबाद, भगत सिंह जिंदाबाद, सुखदेव जिन्दाबाद, राजगुय जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठी। फांसी जो हमेशा सुबह दी जाती है इन तीनों वीरों को सायं को दी गई और इनके शवों को अंतिम संस्कार के लिये उनके परिवारों को सोंपने की बजाय, शवों के टुकड़े किये गय, उन्हें टोकरों में भर कर जेल के उस रास्ते से निकाला गया जहां से मल और कूड़ा करकट निकाला जाता है। उसके बाद इन लाशों को रात के अंधेरे में फिरोजपुर के पास (हुसैनीवाला) सतलुज नदी के तट पर ले जाया गया। जब शव अधजली अवस्था में थे, उन पर पानी फेंका जाता है और उन टुकड़ों को नदी में फैंक दिया जाता है।
24 मार्च का दिन पूरे भारत मंे शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है, सतलुज नदी के किनारे पर, जहां अंग्रेजों के भाड़े के टटूओं द्वारा संस्कार किया गया था, हजारों नौजवान शहीदों के सम्मान में इकट्ठे होते हैं। शपथ लेते हैं कि जब तक शहीदों के सपने पूरे नहीं होते हम आराम से नहीं बैठेंगे, हमें चाहे बड़े से बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।
ये नौजवान गुलामी के खिलाफ आजादी के लिये, समाज में फैली बुराईयों, अंधविश्वास, जातिप्रथा, छुआछात, किसी भी तरह की लूट, शोषण और दमन के खिलाफ लगातार लड़ते है और जब देश को आम मजदूर किसान अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होता है, अंग्रेज समय रहते इस आक्रोश को समझ जाते हैं और सौदेबाजी कर देश की बागडोर कांग्रेसी नेताओं को सौंप जाते हैं। भगत सिंह और उसके साथियों ने जो कहा करते थे कि लार्ड ईरविन या लार्ड रीडीग की जगह तेज बहादुर सप्रु या पुरूषोतम ठाकुर के आने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा और वही हुआ कोई फर्क नहीं पड़ा। आज देश में अफरातफरी, मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, गुण्डागर्दी, लूटमार, बलात्कार आम बात बन गई। इन हालातों से दुखी हो आज देश के लागे भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव द्वारा अपना बलिदान देकर जो मशाल जलाई थी उसे क्रांति का रूप देने के लिये, उन्हें फिर से याद करते हैं कि:-
भगत सिंह थारे ईन्कलाब तै आवै था जोश जवान में।
हटके फेर जरूरत सै तेरी आज्या हिन्दूस्तान में - टेक
1. तनै बताई वा आजादी हमनै ना मिली।
तनै चाही जो कली खिलाणी वा रहग्यी बिना खिली।
रूखां के तै ठूंठ हो लिये या माली नै चाल चली।
बाड़ खेत नै खाण लागग्यी ना सिर तै विपता टली।
खड़ा गेट पै मजदूर रौवे किसान रोवै खलियान में।
2. अंग्रेज गये तो काले आग्ये ना किमे हुई आणी जाणी।
लूट खशोट न्यूये चालै ना बदली चाल पुराणी।
साहूकार बड़े वैं राज के मालिक ना गई बात पिछाडी।
वे ही रीति वे ही नीति कहे राम कहाणी।
कदे धर्म और जात गोत पै चर्चा रहै जुबान में - 2
3. पैंसठ फीसदी अणपढ़ सैं हुई सत्तर साल की आजादी।
उस्सी फीसदी मोहताज हुये या भूखी रही आबादी।
मुफ्त दवाई ना मिलै पढ़ाई मोल बिकै सैं बेमियादी।
भ्रष्टाचार गया फैल चौगरदे न्याय की भी कीमत लादीं
पहर के खादी ऐब ढ़के जां राज की दूकान में - 3
4. सन सैंतालिस में छोड़ दिया कौण था वो भगत सिंह।
छोड़ चले तेरी उस राही नै राज के नेता होग्ये नंग।
गांधीवादी नेता होग्ये और कमेरे हो रहे तंग।
रघबीर सिंह न्यू फिरै ढूंढता किते दिखज्या लाल रंग।
इस बिन राह ना देवे दिखाई खूब लगया ध्यान में।- 4
वार्ताः- तो आओ देश की आजादी की इस जंग में अपना सब कुछ कुर्बान करने वाले 22 लाख शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिये उनके बताये रास्ते पर चलने का संकल्प लें। उन शहीदों के विचार की, अंग्रेजों के जाने के बाद इस देश में मजदूर किसान खुशहाल हों, सबको मुफ्त पढ़ाई मुफ्त दवाई और रोजगार मिले, भूख, गरीबी, बदहाली ना हो। उस आदर्श के लिये एक बार फिर से जत्थेबंदी की जाये। आम जनता को फिर से संगठित किया जाए और यही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।